उपन्यास: ख़्वाब सा कुछ 【पारिवारिक प्रतिछवियों के माध्यम से समाज की नग्न सच्चाईयों से मुठभेड़ 】- रमेश शर्मा
ख़्वाब सा कुछ संजय मनहरण सिंह का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास है। संजय कवि भी हैं और कहानियाँ भी लिखते हैं । उनके किसी भी विधा की रचनाओं में एक तरह की साम्यता यह नज़र आती है कि वे कलात्मक भाषा और स्वप्न दृष्टि से जुड़े प्रयोग को लेकर बहुत उत्सुक और सचेत नज़र आते हैं । अभिव्यक्त होने वाली रचना से जुड़े दृश्यों को व्यक्त करने के लिए उनके पास कलात्मक भाषा की एक मौलिक शैली है जो उनकी अपनी कल्पना से जन्म लेती हुई दिखाई देती है । इससे घटनाओं का सम्प्रेषण और सघन होता है। उनकी कविताओं, कहानियों के अलावा नया प्रकाशित उपन्यास "ख़्वाब सा कुछ" में भी उनका यह कौशल दिखाई देता है। उपन्यास की घटनाओं से जुड़े पात्रों के नामों का चयन भी कुछ इस तरह उन्होंने किया है कि उससे पाठक के मन में एक अतिरिक्त जिज्ञासा का भाव उत्पन्न होता है। हरिया, हरिमन , ऐंठबहार, घुमनाहा , बुतरू , जोजबोलही , बनगिहाँ, टेटमेरही सोनपियारी इत्यादि नाम वाले पात्रों से ही यह जाना जा सकता है कि उपन्यास सर्वहारा जीवन पर केन्द्रित है।
किसी भी उपन्यास को लेकर यह मान्यता स्थापित है कि अगर वह जीवन के बड़े केनवास पर फैले यथार्थ आधारित घटनाओं से जुड़े अनुभवों को बारीकी से टटोलते हुए लिखा जाए तो उसका असर स्वाभाविक तौर पर अलग से महसूस होता है । किसी भी उपन्यास लेखक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उसे विभिन्न पात्रों के निजी जीवन से जुड़े मनोविज्ञान की समझ किस स्तर तक है। वह उन पात्रों के साथ मनोवैज्ञानिक स्तर पर कितना न्याय कर सका है। उपन्यासकार की समझ जितनी गहरी होगी , पात्रों का चरित्र चित्रण वह उतनी ही गहराई से कर पाएगा ।
ख़्वाब सा कुछ उपन्यास एक परिवार की चार पीढी के पात्रों के जीवन चरित्र पर केन्द्रित है । हरिया, बाबा, हरिमन से लेकर घुमनाहा , ऐंठबहार और बुतरू तक। इन सबके इर्द गिर्द बाहरी दुनिया की घटनाएं भी विस्तार पाती हुई यहां नज़र आती हैं। इस बाहरी दुनिया में जंगल है, जंगल के पशु पक्षी और जीवजंतु हैं जो अपने जंगल ब्वाय बनगिहाँ के लिए संकट के समय जीवंत रूप में एकत्रित हो जाते हैं । इस बड़ी दुनिया में स्कूल है , मास्टर जी और बच्चे हैं , इस बड़ी दुनिया में न्याय-अन्याय के बिरूद्ध संघर्ष है , क्रांति का बिगुल है जिसके केंद्र में बनगिहाँ जैसे युवाओं की बलिदानी कथा का जिक्र आता है। इस बड़ी दुनिया में क्रांतिकारी कविताओं का प्रसंग भी घुला मिला है । इस बड़ी दुनिया में रोजी रोटी की तलाश में निकले ऐंठबहार जैसे युवा का संघर्ष है जो महज कविताएँ लिखकर दो रोटी कमा लेने के लिए महानगर में पड़ा है।इस बड़ी दुनिया में घुमनाहा जैसे युवा की भी कहानी है जिसकी नाक पैसे की बू का पीछा करती हुई उसे तुरंत सूंघ लेती है , जो समय आने पर किसी भी हद तक नीचे जाकर खून के रिश्तों को अपने पैरों तले मसल सकता है।
ख़्वाब सा कुछ उपन्यास के केंद्र में परिवार की चार पीढ़ी के एक एक पात्रों का चरित्र चित्रण संजय ने इस तरह किया है कि वह बहुत स्वाभाविक रूप में संप्रेषित होता है। पात्रों की मूर्त अमूर्त निजी गतिविधियाँ एवं उनके निजी व्यवहार के स्वाभाविक चित्रण की वजह से उनका व्यक्तित्व साफगोई से उपन्यास में उभर कर आया है ।
परिवार की पहली पीढ़ी की पात्र हरिया और दूसरी पीढ़ी के पात्र बाबा, ददा, गुरबारी और गोसइनीन के बीच जीवन के किस्से जिस तरह आकार लेते हैं, उसकी स्वीकृति/अस्वीकृति को लेकर उपन्यास एक विमर्श को भी साथ साथ आगे बढाता हुआ चलता है।
आदिकाल से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था हो या आज का उत्तर आधुनिक समाज , हर समय समाज में स्त्री पुरुष की यौन वर्जनाएँ विद्यमान रही हैं । यौन कुंठा से ग्रस्त , रिश्तों की सीमा रेखा को लांघते ददा जैसे पात्रों पर आरोप के माध्यम से उपन्यास समाज की उन घटनाओं को भी सामने रखता है जो कहीं दबी छुपी होती हैं। ऐसी घटनाएँ महज वैयक्तिक या पारिवारिक प्रसंग न होकर पूरे समाज से सामान्यीकृत होकर जुड़ती हैं।
उपन्यास में बाबा और उसकी पत्नी गुरबारी के जीवन से जुड़ा निम्न प्रसंग आता है। इसे पढ़कर पारिवारिक जीवन के अंधेरे-उजाले पक्ष को समझा जा सकता है--
अंदर पहुंचते ही वह ठिठक गया। उसने देखा दीवार की खूंटी पर ददा का सफेद कुर्ता टंगा है। रस्सी पर उसकी धोती सूख रही है। उसका चमड़े का जूता कोने के टेबल के नीचे रखा हुआ है।उसके खुशबू वाले तेल की शीशी भी आले पर रखी हुई है। उसके पीछे गुरबारी भी भीतर आ गई उसने गमछा में लपेटकर हरिमन को बिस्तर पर लिटा दिया । वह गहरी नींद में था । गुरबारी ने उसे कमिहा बाई के बारे में बताया , उसने नाई के बारे में बताया , उसने गाय के बछड़े के बारे में बताया , उसने हरिया के बहरेपन के बारे में बताया , उसने गोसाइनीन की दवा की शीशी के बारे में बताया , लेकिन बाबा चुप रहा । उसकी चुप्पी से गुरबारी डर गई । उसने गुरबारी का बाल पकड़ा और उसे हिलाते हुए बोला "यह सब क्या है?" गुरबारी सहम गई । वह डर गई , लेकिन वह बिल्कुल भी नहीं डरी । डरने से शक भरोसे में बदल सकता था। उसके पास बहुत सारे जवाब थे जो उसने दिए। उसके पास कोई जवाब नहीं था इसलिए फिर वह चुप हो गई। बाबा चीख पड़ा ..."बकरे को चरना मत सीखा।"
इसके बाद कमरे में चुप्पी गिरने लगी । ओले की तरह ठोस । फिर न तितलियां दिखीं , न ददा का कुर्ता और न ही उसका जूता । दीवारों पर करोड़ वाट की सफेदी नीच लगने लगी । बिस्तर में नींद की उपज बंद हो गई । बच गई तो सिर्फ बंजर नजदीकी और उदास सोहबत से चटकी रातें। "
उपन्यास में नरक दरवाजा बिषय का जो जिक्र है दरअसल वह बिषय इसी प्रसंग के गर्भ से जन्मा बिषय है। आमतौर पर दुःख और त्रासदियों से भरे जीवन को नारकीय जीवन की संज्ञा दी जाती है। माँ हरिया का छोटा बेटा बाबा का जीवन इस नरक दरवाजा वाले कमरे के भीतर विस्तारित हुआ और वहीं खत्म भी हुआ । उसका जीवन दुःख और त्रासदियों की इसी नारकीयता से भरा हुआ रहा। उसकी पत्नी गुरबारी और उसके बीच उसके बड़े भाई ददा की अवांछित आवाजाही के संकेत उपन्यास में कुछ इस तरह आते हैं कि बाबा के बेटे हरिमन का जन्म लोगों की नज़रों में एक धुंधलका लिए हुए सामने आता है। बाबा चकबंदी के काम से बार बार पत्नी गुरबारी को छोड़कर शहर जाता है । उनके बीच समय की लंबी-लंबी दूरियाँ निर्मित होती हैं। इन दूरियों को एक अवसर की तरह नापने की कोशिश करता हुआ ददा उनके बीच आ खड़ा होता है। अशक्त और बहरी माँ हरिया, ददा की लकवाग्रस्त पत्नी गोसाइनीन की उपस्थिति उसकी यौन वर्जनाओं को रोक पाने में अक्षम हैं। इन यौन वर्जनाओं के चक्रव्यूह में न चाहते हुए भी कोई स्त्री घिर सकती है । गुरबारी जैसी सर्वहारा समाज की सीधी सादी स्त्री को इसी तरह के चक्रव्यूह में फंसते हुए देखना भारतीय समाज का एक आम दृश्य है जिसे उपन्यास में सामान्यीकृत करते हुए संकेतों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
हरिमन के जन्म के बाद बाबा की माँ हरिया और गांव के लोगों की शारीरिक भाव भंगिमाओं में अभिव्यक्त जो प्रतिक्रियाएं हैं, वे भी उन विपरीत परिस्थितियों की ओर बाबा को ले जाती हैं जहां से जीवन के नारकीय होने की शुरुवात होने लगती है। गुरबारी का हमेशा के लिए बाबा के जीवन से और फिर दुनिया से भी विदा हो जाने का दुःखद प्रसंग इसी नरक दरवाजे से खुलने वाले कमरे के भीतर की घटना है ।
निम्न मध्यवर्गीय जीवन में परिवार की अंदरूनी घटनाएं सच होकर भी कई बार अविश्वसनीय लगती हैं । ये घटनाएं त्रासदियों से भरी होती हैं । ऐसी असहनीय घटनाओं को भी मनुष्य सहने को अभिशप्त होता है।
बाबा के जीवन से गुरबारी के चले जाने के बाद फूलमती के आने का जिक्र भी उपन्यास का एक अहम हिस्सा है। फूलमती जो उम्र में उससे बीस वर्ष छोटी थी, क्या बाबा उसके साथ न्याय कर पाता है ? उपन्यास में यह एक सवाल की तरह है। अगर वह न्याय कर पाता तो फूलमती के जीवन में खोरबाहरा जैसा युवा मर्द क्यों रहता ? उपन्यास को पढ़ते हुए इस तरह के प्रश्न पाठकों के जेहन में उभर सकते हैं और उनका जवाब उन्हें खुद ही ढूंढना पड़ सकता है।
उपन्यास में पारिवारिक पृष्ठभूमि के अतीत की स्मृतियों को, जो कि सच के बहुत करीब हैं, एक ख़्वाब की तरह देखते चले जाने का चित्रण जगह जगह आता है। परिवार की चौथी पीढ़ी तक पहुंचती स्मृतियों में संघर्ष, दुःख,यौन आकर्षण के साथ साथ रोमांच और क्रांति की बू भी आती है।
बाबा और गुरबारी का बेटा हरिमन इन्हीं स्मृतियों में कैद तीसरी पीढ़ी का वह पात्र है जिसके इर्द गिर्द अनेक कहानियाँ जन्म ली हुईं दिखाई पड़ती हैं। हरिमन जो एक स्कूल मास्टर है। हरिमन जिसे शराब पीने की लत है। हरिमन जिसकी भीतरी दुनिया क्रांतिकारी विचारों से लैस है। हरिमन जिसे कभी मधुलिका नामक स्त्री से प्यार रहा होगा और बनगिहाँ जैसा क्रांतिकारी युवक उनके प्यार की निशानी बनकर जन्म लिया होगा। हरिमन जिसे नक्सल मूवमेंट से जुड़े इस युवा बनगिहाँ के कारण पुलिस बार बार पकड़ लेती और टॉर्चर करती है। हरिमन जिसकी बाइसकिल के टायर की हवा अक्सर खुल जाती और विद्यार्थी अपने मुंह से फूंककर उसमें हवा भरने की कोशिश करते।
उसी हरिमन के जीवन से जुड़ी स्मृतियाँ बेटे ऐंठबहार की आंखों में ख़्वाब की तरह आती जाती हैं । ये ख्वाब हमें उस सच से भरी दुनिया में ले जाती हैं जो बहुत खुरदुरी है पर जीवन के अनेक रंग वहां मौजूद हैं। उन रंगों से गुजरे बिना मनुष्य का जीवन अधूरा सा लग सकता है।
हरिमन के जीवन की जमीन भी बहुत खुरदुरी है। वह भी उसी राह पर चलने को अभिशप्त है जहां हर कदम पर दुख, तकलीफ और संघर्ष है। अपने पिता 'बाबा' की तरह उसके जीवन का कमरा भी उसी नरक दरवाजे से खुलता है जहाँ घुमनाहा जैसी संतानें प्रतीक्षा में खड़ी होकर उसे नरक की ओर ले जाने के लिए तैयार हैं । उसके जीवन में अपने प्यार की निशानी , नक्सल मूवमेंट से जुड़े 'बनगिहाँ' का विछोह रह रह कर आता है।उसके कारण पुलिस आए दिन उसे उठा लेती है। उसकी देह पीड़ा से भरी हुई है। बनगिहाँ की मृत्यु-कथा उसके भीतर रह रह कर तड़प पैदा करती है। स्कूल मास्टर हरिमन को शराब की लत है।वह शरीर से कृशकाय है पर इन सबके होते हुए भी उपन्यास के भीतर उसका जो चरित्र है वह एक ईमानदार और खरे आदमी का चरित्र है।वह विचारों से क्रांतिकारी है और समाज की बेहतरी का सपना उसकी आँखों में कैद है।
उसकी पत्नी शांता की छवि एक नितांत घरेलू और सीधी साधी स्त्री के रूप में उभरती है । तमाम वर्जनाओं के बाद भी पिता की अनुकम्पा नियुक्ति को बंदूक की नोक पर हड़प कर परिवार से अलग हो चुके अपने नाकारा पुत्र घुमनाहा से उसका प्रेम कभी विदा नहीं होता। वह ऐंठबहार और बुतरू से छुप छुप कर घुमनाहा और बहु सोनपियारी के बच्चे को देखने के लिए अस्पताल जाती है। घुमनाहा को तो हर जगह से पैसे की बू आती है इसलिए हर भेंट पर वह अपनी माँ से दो सौ रुपये वसूल लेता है। गोया माँ उससे भेंट करना चाहे तो हर भेंट के लिए उसे रुपये देने होंगे। भारतीय माँओं का चरित्र अमूमन ऐसा ही होता है। वे संतानों से विलग होकर अपनी दुनिया में अधूरी सी होने लगती हैं। शांता के साथ भी यही प्रसंग जुड़ा है।
अपनी माँ , अपने पिता , अपने भाइयों और आसपड़ोस को लेकर ऐंठबहार के मन में रह रह कर उठने वाली स्मृतियों को एक ख्वाब की तरह उसी की आंखों से देखना इतना रोचक है कि उपन्यास पाठक को बांधे रख सकने में सक्षम है। युवाओं के भीतर उठने वाली यौन इच्छाओं के दृश्यों का चित्रण भी उपन्यास के भीतर कहीं कहीं मिलता है । दृश्य के स्तर पर इस चित्रण में कलात्मकता का जो पुट है , वह उसे कहीं अश्लील होने नहीं देता बल्कि उसे स्वाभाविक बनाता है। ऐंठबहार और जोजबोलही से जुड़े दृश्यों में हम इसे महसूस कर पाते हैं।
यह उपन्यास बारह खंडों में विभाजित है।
नरक दरवाजा, देह पीड़ा का घर, पसलियों के पीछे, एल पूबलिको एस रेई, पैसे की बू, कवि और खाली डायरी , जरूर आबे ना , स्मृतियों के भीतर, जुगनू और राख, लौटने की कथा में व्यथा , अग्नि स्नान और लकड़ी का संदूक।
हरेक खंडों को पढ़ते हुए कवि संजय की गद्यकथा के सामर्थ्य से हम परिचित होते हैं। विषयों की क्रमबद्धता और उनकी त्रासदपूर्ण संजीदगी के बावजूद उनका लालित्य और उनकी मिठास हमें उपन्यास के संग हो लेने को बाध्य करती है।
'कवि और खाली डायरी' वाले खण्ड में इन पंक्तियों को पढ़कर अंदाज लगाया जा सकता है जैसे लेखक हमें भाषा के कल्पना लोक की सैर करा रहे हैं-
"ऐंठबहार ने अपनी अस्थियों को अपनी देह के भीतर समेट लिया। देह एक खाई की तरह गहरी और ठंडी सी। उसके तल में इच्छाओं की बासी महक बजबजा रही थी। रात की अंधेरी चादर पर झींगुरों की आवाजें महीन छिद्र बना रही थीं। बिस्तर पर नींद के इतने सारे धब्बे थे, जिसके दाग मन पर पड़ रहे थे । मन हमेशा की तरह निश्चल और चिपचिपा । मछली की तरह हाथों से छूट जाता था।"
उपन्यास के हरेक खण्ड में इस तरह के अनेक प्रसंग हैं जहां पंक्तियां एक कलात्मक दृश्य का रूप ग्रहण करती हुईं जान पड़ती हैं।
यह उपन्यास एक परिवार की विभिन्न पीढ़ियों की प्रतिछवियों के माध्यम से समाज की उन सच्चाइयों, उन प्रसंगों से भी हमारा मुठभेड़ कराता है जिन पर बातचीत करने से अमूमन हम बचते हैं। इस उपन्यास को पढ़ते हुए अनेक विमर्शों, अनेक रोचक प्रसंगों से भी हमें गुजरने का अनुभव हो सकता है जो अंततः भारतीय सामाजिक जीवन की गहराइयों में जाकर नाभिनाल बद्ध हैं।
मेरी नज़र में एक बार इस उपन्यास को जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
उपन्यास: ख्वाब सा कुछ
लेखक : संजय मनहरण सिंह
प्रकाशक: लोक भारती प्रकाशन
पेपर बैक्स संस्करण मूल्य: ₹350
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संपर्क: 92 श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
मो. 7722975017

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