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क्या गांधी कोई राजनीतिज्ञ हैं?

यूथ और गांधी के बीच का राजनैतिक परिदृश्य

यूथ को गांधी के निकट ले जाने की कोशिश के किसी भी उपक्रम में विभिन्न दिशाओं से  यह सवाल खड़ा होने लगता है कि गांधी राजनीतिज्ञ हैं या नहीं? यूथ को गांधी से आखिर किस तरह जोड़ा जा सकता है?

राजनीति कोई अस्पृश्य बिषय नहीं है । कोई दो राय नहीं कि विचारों के दायरे में हर आदमी राजनीति की परिधि से बाहर भी नहीं है। जो कोई मतदान करने जाता है , किसी न किसी दल को अपना समर्थन देता ही है। यहां यह समझना होगा कि उसका समर्थन कई बार परिस्थिति जन्य होता है। लोकहित में, जिसे वह उचित समझता है उस वक्त समर्थन कर देता है। उसकी पक्षधरता यहां किसी राजनीतिक खांचे में कैद न होकर अपने विचारों के भीतर कैद होती है। किसी व्यक्ति के इस आचरण को राजनीति के दायरे में लाकर परिभाषित करना न्यायसंगत होगा, मुझे ऐसा नहीं लगता। व्यक्तिवादी राजनीति की परिभाषा उस जगह अधिक सुसंगत लगती है जब व्यक्ति अपने विचारों की कैद से मुक्त होकर या अपने स्वयं के विचारों से मुक्त होकर एक पक्ष तय करके दृढ़ता से खड़ा नज़र आता है।

आम आदमी जो चेतना और विवेक के स्तर पर अपनी जगह दृढ़ है , उसकी पहली प्राथमिकता राजनीतिक पक्षधरता न होकर विवेक अनुसार निर्णय की होती है जो जनहितकारी हो। यह आचरण राजनीतिक होना नहीं होता है। 

यहां गांधी भी विवेक और चेतना के स्तर पर उस आम आदमी की तरह हैं जिसकी पक्षधरता राजनीति न होकर विवेकसम्मत उचित निर्णय है। यहां गांधी को राजनीति की बनी बनाई परिभाषा के खांचे में देखना मेरे खयाल से एकांगी होगा। गांधी को समग्रता में देखने समझने के लिए सर्वप्रथम उनकी चेतना, उनका विवेक, उनकी सहज जीवन शैली, सामाजिक जीवन के प्रति उनकी आस्था , एक सहज जीवन यापन के लिर  सत्य अहिंसा करुणा से जुड़ा उनका दर्शन , इन सब पर पहले बात तो करनी होगी। 

यूं भी दलगत राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की कलाबाजियों से गांधी की निकटता कभी रही नहीं । फिर भी दलगत राजनीति के भीतर उन्हें खींच कर लाए जाने की कोशिशें अमूमन इसलिए होती हैं कि अपने हिसाब से राजनीति उन्हें परिभाषित कर सके। समकालीनों से उनके मतभेदों को लेकर चर्चाएं भी इसलिए होती हैं कि राजनीति अपने लिए कोई बड़ा स्पेस ढूंढ सके। जबकि इन चर्चाओं का कोई विशेष अर्थ निकलता हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। ऐसा कोई अनुभव भी मैं अब तक नहीं कर सका।

विचारवान और चेतना संपन्न लोगों के बीच मतभेदों का होना लाज़िमी है । यह हर समय हो सकता है।  ऐसे मतभेदों को भी राजनीतिक मतभेदों की तरह व्याख्यायित करना न्याय संगत होगा ,ऐसा भी मुझे नहीं लगता। 

गांधी उतने ही राजनीतिज्ञ हैं जितना कि एक आम आदमी। इसलिए उनके जीवन दर्शन के बरख्स उनके जीवन से जुड़ी कोई भी राजनीति बहुत गौण हो जाती है।

मेरे हिसाब से गांधी को व्यक्ति विशेष के रुप में ज्ञान आधारित मार्ग से यूथ के बीच ले जाने की कोशिशें भी कारगर नहीं हो सकेंगी।

यह हमें याद रखना चाहिए कि बालक के जीवन में प्रेम पहले आता है और ज्ञान बाद में। प्रेम को बाईपास करके ज्ञान को आगे ले जाने की कोशिशें उनके बीच बहुत कम संप्रेषित हो पाएंगी। प्रेम के बिना वह ज्ञान स्थायी भी नहीं होगा। इसलिए गांधी को ज्ञान के बजाए व्यवहार से सीखना अधिक कारगर होगा।

रमेश शर्मा

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