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हान कांग को साहित्य का नोबल पुरस्कार और विजय शर्मा का आलेख बुकर साहित्य और शाकाहार

कोरिया की सबसे बडी और मशहूर किताब की दुकान का नाम है "क्योबो" जिसमें तेईस लाख किताबें सजी रहती हैं। इस पुस्तक भंडार की हर दीवार पर किताबें सजी हैं, लेकिन एक दीवार दशकों से सूनी है। उस पर टंगे बोर्ड पर लिखा है "साहित्य के नोबेल विजेता कोरियाई लेखक के लिये आरक्षित"। आज उस बोर्ड का सूनापन दूर हुआ है। कोरियाई साहित्य प्रेमियों की उस इच्छा को वहां की लेखिका हान कांग ने आज पूरा किया है।

इस वर्ष 2024 में साहित्य का नोबल पुरस्कार कोरिया की उपन्यासकार हान कान्ग को मिला है। जब उन्हें 2015 में बुकर पुरस्कार मिला था तो उन पर प्रख्यात लेखिका विजय शर्मा ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा था। उस आलेख को आज उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया है। इस आलेख को पढ़कर कोरियाई उपन्यासकार  हान कान्ग के लेखन के सम्बंध में हमें बहुत कुछ जानने समझने के अवसर  मिलते हैं। उनका आलेख यहाँ नीचे संलग्न है-

बुकर, साहित्य और शाकाहार

विजय शर्मा

इस साल 2015का मैन बुकर इंटरनेशनल पुरस्कार कोरिया की उपन्यासकार हान कान्ग को मिला है। यह पुरस्कार उन्हें उनके उपन्यास ‘द वेजीटेरियन’ के इंग्लिश अनुवाद के लिए मिला है। असल में उन्होंने इसे कोरियन भाषा में लिखा है जिसका इंग्लिश अनुवाद डेबोराह स्मिथ ने किया है। अब इस पुरस्कार में कुछ परिवर्तन हुआ है, इस साल से मैन बुकर इंग्लिश में अनुवादित इंग्लैंड में प्रकाशित सर्वोत्तम कृति को दिया जाएगा।

हान कान्ग का उपन्यास पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रतिरोध में तथा समाज की अनमनीय प्रथाओं पर है, लेकिन यह शाकाहार की वकालत भी करता है। उपन्यास मनुष्य की संवेदनशीलता की बात करता है, कोमलता और निर्मलता की बात करता है। माँसाहार से हान का तात्पर्य मनुष्य की हिंसात्मक प्रवृति से है, उसकी संवेदनहीनता से है, शोषण की उसकी प्रकृति से है। असल में इस पुस्तक के बीज उन्हें कवि यी शेंग की एक कविता की पंक्ति से मिले। यह आधुनिकतावादी कवि अपनी इस कविता में कहता है कि एक मनुष्य को वनस्पति होना चाहिए। इस कविता को ले कर इस कवि की खूब आलोचना हुई थी क्योंकि इस कविता द्वारा कवि सांस्कृतिक विचारधारा से विरोध प्रकट कर रहा है। कवि के इसी विश्वास को आधार बना कर हान कान्ग ने 1997 में ‘द फ़्रूट ऑफ़ माय वुमन’ नाम से एक कहानी लिखी। इस कहानी की नायिका एक पौधे में परिवर्तित हो जाती है। ‘द वेजीटेरियन’ में वे इसे ही और अधिक ज्वलंत रूप में प्रस्तुत करती हैं। हान कान्ग के अनुसार किसी रचना को केवल सांस्कृतिक सीमाओं में रिड्यूस करके नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े पाठकों तक पहुँचने के बाद किसी रचना का एक ही अर्थ नहीं रह जाता है। वे कहती हैं कि उनका उपन्यास केवल कोरिया की पितृसत्ता के लिए नहीं है, वह समस्त मानव जाति के लिए है।

सिर्फ़ भोजन के लिए किसी जानवर को मारना जबकि तमाम शाक-सब्जी उपलब्ध है। मात्र भोजन के लिए किसी खूबसूरत शरीर को क्यों नष्ट करना! किसी और ने भी पूछा है अगर आप जानवर मार सकते हैं तो मानव-भक्षण क्यों नहीं? भोजन के लिए आदमी को मारना क्यों गलत है? आदमी की माँ का माँस तो आदमी के शरीर के लिए और अधिक मुफ़ीद होगा। लेकिन हम ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि यह संवेदनशीलता का मामला है। हान कान्ग के अनुसार भी ‘द वेजीटेरियन’ मनुष्य की मूल प्रवृति से जुड़ा प्रश्न है। यह उसकी कोमलता और निर्मलता का प्रश्न है। यह उसके दोहरे मापदंडों का प्रश्न है। माँसाहार के द्वारा वे मनुष्य की हिंसात्मक प्रवृति से अधिक संवेदनशीलता और शोषण जैसे मुद्दों को रेखांकित करना चाहती हैं। उन्होंने इसके द्वारा मानव जीवन में अबोधता की सण्भावना और असंभावना के उस शाश्वत प्रश्न को उठाया है जो सौंदर्य और हिंसा में गडमड हो गया है। यह प्रश्न किसी एक स्थान का न हो कर सार्वभौमिक मनुष्यता का है। उनके अनुसार उनका यह उपन्यास हिंसा और अद्या के इसी प्रश्न के आस-पास घूमता है।

हान कान्ग की नायिका योन्ग-हाई एक सामान्य घरेलू स्त्री है। एक दिन वह बहुत बेचैन करने वाला स्वप्न देख कर उठती है। स्वप्न में वह खुद को भयंकर जीव में बदलता देखती है। उपन्यास में नायिका अपनी बात, अपने मन में चलने वाले विचारों को अभिव्यक्त नहीं करती है वरन उसकी दशा का वर्णन तीन अन्य लोग – उसका पति, उसका बहनोई तथा उसकी बड़ी बहन करती है। वह एक बार अपने स्वप्न के विषय में अपने पति को बताती है। उसके पति को उसमें या उसके स्वप्न में कोई रूचि नहीं है अत: स्वप्न भी विस्तार नहीं पाता है। एक दिन उसका पति देखता है कि वह फ़्रिज से निकाल कर खाने का सब सामान बाहर फ़ेंक रही है। किचेन का फ़र्श प्लास्टिक बैग्स और एयरटाइत कंटेनरों से पटा हुआ था। फ़र्श पर पति के पैर धरने की जगह न थी। वह देखता है सब फ़ैला हुआ है, शाबू-शाबू बनाने के लिए रखा गौमांस, सूअर का पेट, बछड़े की रान, वैकुम-पैक्ट बैग में रखी समुद्रफ़ेनी, उसकी सास की लाई हुई ईल के कतले, पीली डोर से बँधे सूखे मैंढ़क, बिना खुले जमे हुए...

जब पति चीख कर पूछता है कि वह क्या कर रही है तो उत्तर मिलता है, ‘उसने एक स्वप्न देखा है।’ और वह पति की उपस्थिति को अनदेखा करते हुए सारा कुछ उठा कर कूड़े के डिब्बे में डाल देती है। कोई पति भला कैसे सहन करेगा ऐसी उपेक्षा, ऐसी बरबादी! गौमांस, सूअर का गोश्त, मुर्गी के टुकड़े और तो और करीब 200,000 वॉन की कीमती समुद्री नमकीन ईल। सब कूढ़े के ढ़ेर में! जरूर इस स्त्री का दिमाग चल गया है। योन्ग-हाई की माँ को जब उसके शाकाहारी होने का पता चला तो उसे समझ में नहीं आया यह स्त्री कैसे जीवित रहेगी। पति के बॉस की पार्टी में उसके मांसाहार न करने पर पति की खूब किरकिरी हुई। घर पर पारिवारिक पार्टी में उसका पिता उसे जबरदस्ती गोश्त खिलाने का प्रयास करता है, चाँटा मारता है। पिता-भाई से पार न पा कर वह अपनी कलाई काट लेती है।उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है।

पति उससे पूछता है, ‘तुम कह रही हो कि अब से तुम गोश्त नहीं खाओगी?’ उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। ‘ओह, सच में? कब तक?’ आध्चर्यचकित पति का प्रश्न था। पत्नी का उत्तर उससे भी अधिक अनोखा था, ‘मैं समझती हूँ...सदा के लिए।’इतना ही था तो कोई बात नहीं शायद पति उसका आदी हो जाता मगर शाकाहारी होने के साथ-साथ योन्ग हाई को सैक्स से भी अरूचि हो जाती है, वह पति को पास नहीं आने देती है। पूछने पर कहती है कि उसे पति के शरीर से माँस की बदबू आती है। अब भला ऐसी पत्नी का कोई क्या करे। इससे पहले वह पति की हर इच्छा बिना किसी ना-नुकुर के माना करती थी। अब वह उसके किसी काम की न थी अत: वह उससे छुटकारा पा लेता है, उसे तलाक दे देता है। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी!

पति उसकी जिद देख कर हैरान था। उसे मालूम था कि  अतीत में शाकाहारी होना इतना विरल भी नहीं था। लोग विभिन्न कारणों से शाकाहारी होना चुनते हैं। कभी एलर्जी से छुटकारा पाने के लिए, कभी पर्यावरण से दोस्ताना व्यवहार करने के लिए गोश्त खाना छोड़ते हैं। बुद्धिस्ट सन्यासी इसका प्रण करते हैं क्योंकि उनका धार्मिक प्रण प्राणी मात्र को हानि न पहुँचाना है। युवतियाँ वजन घटाने के लिए यह करती हैं। अपच से नींद न आने के कारण भी लोग माँसाहार छोड़ देते हैं। योन्ग हाई का पति सोचता है कि बुरी आत्मा के प्रभाव से भी लोग माँस खाना छोड़ देते हैं। लेकिन उसकी पत्नी के द्वारा यह किया जाना उसे पत्नी की हठधर्मी के अलावा और कुछ नहीं लगता है। उसका मानना है कि केवल पति की इच्छा के विरुद्ध जाना ही इसका एकमात्र कारण है। उसकी समझ के बाहर है कि अभी तक जो स्त्री इतनी सामान्य थी वह अचानक इतनी विद्रोही कैसे बन गई।

योन्ग हाई को परिवार वाले मानसिक रोगी मान कर मानसिक रोगियों के अस्पताल में भरती कर देते हैं। उसे निर्जन काला, अंधकारमय जंगल दीखता है। वह डरी हुई है। चारो ओर उसे खून, खून टपकते माँस के लोथड़े दीखते हैं। गोश्त और टपकते खून से वह खुद को घिरा पाती है, उसे अपने कपड़े खून से सने-रंगे नजर आते हैं। उसे अपने मुँह में, अपनी त्वचा पर बस खून-ही-खून दीखता है। बचपन से अपने पिता की क्रूरता उसका पीछा करती आ रही है। उसे याद आता है कि कैसे एक बार उनके पालतू कुत्ते विटनी ने उसे काट लिया था। रिवाज के अनुसार पिता ने कुत्ते को गाड़ी में बाँध कर गोल-गोल घुमा-घुमा कर मार डाला था। सारे समय बच्ची को यह क्रूर वीभत्स दृश्य देखते रहने को मजबूर किया था। बच्ची को निरंतर देखती कुत्ते की आँखें उसकी आत्मा पर घुप जाती हैं। इतना भी होता शायद बच्ची भूल जाती लेकिन शाम को उसी कुत्ते के गोश्त को पका कर समारोह मनाया जाता है। बच्ची जब वह गोश्त खा रही है उसे कुत्ते की आँखें याद आ रही हैं। अट्ठारह वर्ष की उम्र तक पिता उसे बराबर मारता था, शादी के बाद भी वह गोश्त न खाने पर उसे थप्पड़ मारता है, जबरदस्ती उसे गोश्त खिलाने का प्रयास करता है।

माँसाहार छोड़ देने का नतीजा होता है, योन्ग हाई का वजन गिरने लगता है। उसकी त्वचा रूखी-सूखी हो जाती है। मार्केस भी अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ में कहते हैं शाकाहारी का चेहरा सपाट होता है। लेकिन कुछ लोगों को शाकाहारी लोगों के मुँह पर एक तरह की आभा, एक तरह की कांति नजर आती है। शाकाहारी व्यक्ति गरिमापूर्ण, नरम, अधिक स्त्रीगुणपूर्ण, कम आक्रमक, अधिक ग्रहण करने वाला होता है। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार! विचार करना होगा, परीक्षण करना होगा कि यह सब कहाँ तक सही है। मगर यह सही है कि शाकाहार आपके शरीर में एक तरह का रासायनिक परिवर्तन लाता है और माँसाहार दूसरी तरह का। हमारे यहाँ तीन तरह के भोजन की बात होती है: सात्विक, राजसी और तामसिक। ऐसा कहा जाता है कि सात्विक भोजन ताजा, सुस्वादू और ऊर्जावान होता है। राजसी भोजन मिर्च-मसाले से भरपूर होता है तथा शरीर में रजस यानि क्रोध, गर्मी पैदा करता है, जबकि तामसी भोजन सड़ा-गला, बासी होता है और खाने पर आलस्य उत्पन्न करता है।

खैर लौटे योन्ग हाई की ओर। अस्पताल में उसे बलपूर्वक खिलाने-पिलाने की चेष्टा की जाती है। उसकी नाक और गले में ट्यूब डाल कर उसके भीतर खाना-पीना डालने की कोशिश की जाती है। उपन्यास दिखाताहै कि आज समाज में व्यक्ति की इच्छा-अनिच्छा का कोई स्थान, कोई सम्मान नहीं है। यह लोगों की असंवेदनशीलता को भी प्रकट करता है। जो भी व्यक्ति समाज की प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध एक भी कदम उठाता है समाज उसका दमन करता है।

शाकाहार अथवा माँसाहार व्यक्ति का अपना चुनाव होना चाहिए, किसी परिवार, समाज का थोपा हुआ नहीं। यह पूरा मामला संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ है। जैन धर्म माँसहार ही नहीं किसी भी हिंसा की वकालत नहीं करता है इसीलिए वे सूरज डूबने से पहले खा लेते हैं ताकि कोई जीव खाने के साथ न चला जाए। सांस लेने में भी वे जीव हत्या के विरुद्ध हैं अत: नाक-मुँह कपड़े (मोपती) से बाँध कर रखते हैं। वैसेवक्त के साथ बदल रहा है जैन समाज।

यहाँ मुझे अपने सामने हुई दो बातें याद आ रही हैं। हमारे एक परिचित पंजाबी ने एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण लड़की से प्रेम विवाह किया। पति बनते ही माँग की कि पत्नी उसके लिए गोश्त पकाए। उन्होंने न केवल उससे जबरदस्ती गोश्त पकवाया वरन गर्दन पकड़ कर जबरदस्ती उसे गोश्त खिलाया भी। शुरु में वह उलटी कर देती पर बाद में खुशी-खुशी (!) यह काम करने लगी। मेरी एक अन्य रिश्तेदार ने माँसाहारी पति के साथ खुद स्वाद से माँसाहार शुरु कर दिया और एक अन्य रिश्तेदार ने शाकाहार पति की राह अपनाई। वाह रे प्रेम! दूसरा वाकया मेरी एक मुसलमान छात्रा का है। वह समझ नहीं पाती थी कि जिस बकरे को इतनाकीमती मेवा खिला कर इतने प्यार से पाला-पोसा जाता है, उसे ही काट कर कैसे खाया जाता है, कैसे खाया जा सकता है। मगर मायके में आपत्ति करने पर माँ से प्रताड़ना मिलती थी, ससुराल में तो कुछ बोलने का सवाल ही नहीं उठता है।यह गौर करने वाली बात है कि हर बार स्त्री ही परिवर्तित होती है, पुरुष के अनुरूप बदलने का प्रयास करती है। हाँ, हान कान्ग के उपन्यास ‘द वेजीटेरियन’ की नायिका ऐसा नहीं करती है और उसकी कीमत चुकाती है।

व्यक्ति को संवेदनहीन बनाने, क्रूर बनाने के लिए उसे हत्या करने की शिक्षा दी जाती है। ‘तमस’ में आरएस एस की शिक्षा का अंग है मुर्गा काट पाना। मगर जो असंवेदनशीलता सिखाए वह शिक्षा कैसे हो सकती है? शिक्षा वह है जो आदमी को मनुष्य बनाए उसे संवेदनशील बनाए। उसे जीव मात्र का सम्मान करना सिखाए। उसके भीतर प्रेम, आदर, गर्व का भाव जगाए। संपूर्ण प्रकृति के प्रति प्रेम, आदर भाव रखना सिखाए। जीवन का सम्मान करना सिखाए न कि उसे नष्ट करना! जीवन लेने का अधिकार हमारा नहीं है, किसी का नहीं है, किसी का नहीं होना चाहिए।

दक्षिण कोरिया पूर्वी एशिया का ह्यूमन डेवलपमेंट में सर्वाधिक विकसित देश है। वहाँ की विकसित तकनीकि वस्तुएँ सारे विश्व में उपयोग की जाती हैं। उपन्यास ‘द वेजीटेरियन’ इसी समाज की अनमनीय संरचना, व्यवहार की अपेक्षाओं तथा संस्थानों की कार्य पद्धति को एक-एक कर असफ़ल होता दिखाता है। यहाँ शाकाहार चुनाव न हो कर एक तरह का पागलपन है। काफ़्काई शैली के इस उपन्यास को पढ़ना एक भयंकर दु:स्वप्न से गुजरना है। उपन्यास के अंत आते-आते नायिका न केवल माँस खाना छोड़ देती है वरन हर प्रकार का खाना छोड़ देती है और आत्महंता बन जाती है। ‘द वेजीटेरियन’ की नायिका न केवल माँसाहार त्याग देती है वरन स्वयं पेड़ बन जाना चाहती है। वह दावा करती है कि उसे भोजन नहीं चाहिए, वह उसके बिना जी सकती है। बस उसे अगर कुछ चाहिए तो केवल पानी और सूर्य की रोशनी चाहिए। काश! उसके पास कोई उच्चतर विजन होता, कोई मूरिंग होती, कोई एंकरिंग होती, कोई सहारा होता, कोई दर्शन होता, तो वह इस तरह समाप्त न होती। आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर कटाक्ष करता खूबसूरत शैली में, सुंदर चित्रण के साथ व्यक्ति की स्वतंत्रता की अभिलाषा को ले कर लिखा गया यह उपन्यास ‘द वेजीटेरियन’ अपने अंत में पाठक के मुँह में एक कसैला स्वाद छोड़ जाता है।वह आशा करता है, काश ऐसा न होता! हान कान्ग स्वयं स्वीकार करती हैं कि मनुष्य की प्रवृति बचपन से ही उनके लिए एक उलझा हुआ प्रश्न रही है। वे मनुष्य की पवित्रता और हिंसा को ले कर अनिश्चित हैं। वे देखती है कि वह भी आदमी है जो अपनी जिंदगी के विषय में एक पल भी बगैर सोचे हुए खाई में गिरे बच्चे को बचाने के लिए छलांग लगा देता है और वह भी आदमी है जो हिंसा के उपकरण जमा करता है। वे अस्पतालों मेंरक्तदान करने वालों की भीड़ देखती हैं और ऐसे लोगों को स्मरण कारती हैं जिन्होंने युद्ध और हिंसा के समय घायल हुए लोगों की सेवा के लिए अपना घर-बार सब कुछ छोड़ दिया, जबकि ग्वांग्जो आंदोलन काल में इन्हीं के हाथों में हिंसा से भरे क्रूर हथियार थे। वे प्रश्न करती है कि आदमी एक-दूसरे के प्रति ऐसा कैसे कर सकता है? आगे बढ़ कर वे पूछती हैं कि हम इस हिंसा के लिए क्या कर सकते हैं?

बुद्ध का कथन है, ‘अत्याचार के सामने सारे जीव काँपते हैं, सबको मौत से भय लगता है, सब जीवन से प्रेम करते हैं, दूसरों में स्वयं को देखो, तब तुम किसको चोट पहुँचा सकते हो, कौन-सी हानि पहुँचा सकते हो?’शाकाहार दूसरे जीव को न्यूनतम चोट पहुँचा कर जीवन का सलीका है। माँसाहार एक प्रकार की क्रूरता है। जीव हत्या क्रूरता है। विज्ञान करता है कि यदि किसी को मारा जाए तो मरने से पहले उसके शरीर में तमाम नकारात्मक रसायन उत्पन्न होते हैं।जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने दुमुँहेपन की भर्त्सना करते हुए लिखा है, ‘हम रविवार को प्रार्थना करते हैं ताकि जिस राह पर हम चल रहें हैं उस पर रोशनी हो; हम युद्ध से त्रस्त हैं, हम लड़ना नहीं चाहते हैं और फ़िर भी हम मरे हुओं का भक्षण करते हैं।’लियोनार्डो द विन्ची ने भी कहा है, ‘एक समय आएगा जब मेरी तरह मनुष्य जानवरों की हत्या वैसे ही देखेगा जैसे अभी जानवर आदमी की हत्या देखता है।’

1978 के नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार आइज़क बाशविक सिंगर अपने जीवन के अंतिम कई दशकों में शाकाहारी हो गए थे और इसे वे अपनी रचनाओं में घोषित भी करते थे। अपनी कहानी ‘द स्लॉटरर’ में वे एक ऐसे कसाई का कथानक प्रस्तुत करते हैं जो जानवरों के प्रति अपनी दया और अपने पेशे में उन्हें मारने के बीच तालमेल बैठाने की जद्दोजहद में है। सिंगर मानते हैं कि माँसाहारी होने का अर्थ है सारे आदर्शों तथा सारे धर्मों को नकार देना, ‘हम अधिकारों और न्याय की बात कैसे कर सकते हैं, यदि हम मासूम जीव का खून बहाते हैं।’ जब उनसे पूछा जाता कि क्या वे स्वास्थ्य के कारणों से शाकाहारी बन गए हैं, तो उनका उत्तर होता, ‘यह मैंने मुर्गी के स्वास्थ्य के लिए किया है।’‘द लेटर राइटर’ में उन्होंने लिखा है, जानवरों के संबंध में सारे लोग नाजी हैं। जानवरों के लिए यह एक शाश्वत ट्रेब्लिंका (एक नाजी यातना शिविर का नाम) है। 1986 में स्टीवन रोजेन की ‘फ़ूड फ़ॉर स्पिरिट: वेजीटेरियनिज्म एंड द वर्ल्ड रिलीजंस’ की भूमिका में सिंगर ने लिखा कि जब एक आदमी भोजन के लिए किसी जानवार को मारता है तो वह न्याय के लिए अपनी भूख को अनदेखा कर रहा होता है। मनुष्य दया के लिए प्रार्थना करता है, परंतु वह यह दूसरों को देने में इच्छुक नहीं है। तब वह ईश्वर से दया की अपेक्षा क्यों करता है? यह उचित नहीं है, जो आप देने की इच्छा नहीं रखते हैं, उसकी अपेक्षा करना। यह असंगत है। वे कभी भी असंगत या अन्याय स्वीकार नहीं कर सकते हैं। यदि वह भगवान की ओर से आए तब भी नहीं। अगर ईश्वर की ओर से आवाज आए कि वह शाकाहार के विरोध में है। तब उनका कहना होगा कि मैं इसके पक्ष में हूँ। इस बात को ले कर वे इतनी दृढ़ता से अनुभव करते हैं कि ईश्वर तक का विरोध करने को तत्पर हैं।

हान कान्ग कहती हैं, बीसवीं सदी ने अपने घाव केवल कोरिया पर ही नहीं, पूरी मानवता पर छोड़े हैं। उनका जन्म 1970 में हुआ और उन्होंने 1910 से 1945 के दौर का जापान नहीं देखा, न ही कोरिया का वह युद्ध जो 1950 से 1943 तक चला। उन्होंने 1993 से लिखना प्रारंभ किया तब से आज तक लिखना उनके लिए एक निरंतर प्रश्न है। जीवन क्या है? मृत्यु क्या है? मैं कौन हूँ? आदि प्रश्नों से वे जूझ रही हैं। उनके अनुसार इन बातों की चेतना दुनिया की सबसे भयावह बात है। ये शाश्वत प्रश्न हर संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन करते हैं। आप सब भी इस पर विचार करें।

डॉ.विजय शर्मा 


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डॉ. विजय शर्मा, 326, न्यू सीतारामडेरा, एग्रिको, जमशेदपुर 831009

मो. नं. 8789001919

ईमेल: vijshain@yahoo.com

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इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

विचारक प्रोफेसर हेमचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण टिप्पणी Hemchandra Pandey on Anugrah

होली और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अनुग्रह के द्वारा आयोजित परिचर्चा  मौजूं , बहुआयामी और मननीय होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण बन पड़ी है।  होली पर गांधीजी की जिस टिप्पणी का उल्लेख आपने किया है वह कुछ ज्यादा कठोर प्रतीत हो सकती है; लेकिन आज, १३२ वर्षों के बाद भी वह टिप्पणी पूरी तरह गलत नहीं है, यह परिचर्चा में सम्मिलित महिलाओं के विचारों और अनुभवों से सिद्ध होता है। यद्यपि उस टिप्पणी की सीमा श्रीमती तुलसी सुकरा के मंतव्य से स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, भारत सांस्कृतिक दृष्टि से इतनी अधिक विविधता वाला देश है कि एक ही त्यौहार विभिन्न स्थानों और अलग अलग सामाजिक श्रेणियों में इतने अधिक भिन्न भिन्न रूपों में मनाया जाता है कि उसके विषय में दोटूक और सपाट व्यक्तव्य दे पाना संभव नहीं है।  परिचर्चा में सम्मिलित लगभग सभी प्रतिभागियों के व्यक्तव्यों में इस कठिनाई की झलक मिलती है। फिर भी, इस कड़वी सच्चाई को झुठलाना तो सत्य से मुंह फेरने जैसा ही होगा कि पितृसत्ता की काली छाया ने होली के सप्तरंगी सुंदर स्वरूप को ढंक रखा है। त्यौहार और पर्व ऐसे अवसर होते हैं जब हम वैयक्तिकता की सं...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...