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गांधी दर्शन युवा पीढ़ी तक कैसे पहुँचे

 


साहित्य की आँखों से गांधी दर्शन को समझना  

-- रमेश शर्मा 

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गांधी के जीवन दर्शन को लेकर जब भी बातचीत होती है तो हम उसे बहुत सैद्धांतिक, परम्परागत और सतही तरीके से आज की पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं ।और बात चूंकि बहुत सैद्धांतिक और परम्परागत होती है, इसलिए आज की पीढ़ी उसे उस तरह आत्मसात नहीं करती जिस तरह से उसे किया जाना चाहिए । दरअसल गांधी के जीवन दर्शन को लेकर सैद्धांतिक और किताबी चर्चा न करके अगर हम उनकी जीवन शैली को लेकर थोड़ी प्रेक्टिकल बातचीत करें तो मेरा अपना मानना है कि उनके जीवन दर्शन को नयी पीढ़ी तक हम थोड़ा ठीक ढंग से संप्रेषित कर पाएंगे। गांधी जी की जीवन शैली की मुख्य मुख्य बातों को भी हमें ठीक ढंग से समझना होगा।दरअसल गांधी दर्शन का जिक्र जब भी होता है तो सत्य, अहिंसा, करूणा, दया, प्रेम, त्याग, धार्मिक-सौहाद्र इत्यादि जो बातें हैं वो उठने लगती हैं ।इन बातों पर जब हमारी नजर जाती है तो हमें लगता है कि गांधी जी बहुत आदर्शवादी थे और उनके आदर्श को आत्मसात कर पाना संभव नहीं है ।जबकि ऐसा नहीं है ।भले ही गांधी बाहर से बहुत आदर्शवादी दीखते हों हमें पर अपने चिंतन में वे बहुत व्यवहारिक थे , बहुत प्रेक्टिकल थे।  यह बात उनकी जीवन शैली से प्रमाणित होती है ।उनके जीवन शैली की जो प्रमुख बातें हैं उनमें  एक तो उनकी वेशभूषा , उनका रहन सहन , उनका खान पान, उनकी बातचीत , समय को लेकर उनके भीतर मौजूद उनका आत्मिक अनुशासन और समाज के प्रति उनके भीतर मौजूद त्याग की भावना इत्यादि सारी बातें उन्हें प्रेक्टिकल बनाती हैं।  आज जब हम अपनी तुलना उनके जीवन जीने की शैली से करते हैं तो उनकी जीवन शैली के जो घटक हैं उनसे हमारा कोई मेल जोल ही नहीं है । उनकी वेशभूषा को ही देख लें तो हमें महसूस होगा कि वह वेशभूषा उनकी न होकर उस समय के आमजनों की वेशभूषा थी जो उनके जीवन से उन्हें सीधे संलग्न करती थी , शायद इसलिए आमजन को गांधी से संवाद बनाने में कभी कोई हिचक महसूस नहीं होती थी । गांधी जी के जीवन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि उन्हें संवाद बनाने पर गहरा विश्वास था, कभी उन्होंने अपने को आमजन से अलग करके देखने की कोशिश नहीं करी।उनका खानपान बहुत साधारण था , प्रकृति में उनदिनों जो भी चीजें सुलभ थीं उनके माध्यम से ही वे अपना दो वक्त का गुजारा कर लेते थे।  उनका यह व्यवहार ही उन्हें अधिक विश्सनीय बनाता था ।उनके  भीतर किसी किस्म का लालच नहीं था ।उन्होंने कहा भी था कि प्रकृति के पास वो सारी वस्तुएं हैं जो आदमी की जरूरतों को पूरा कर सकती हैं पर आदमी के लालच को प्रकृति कभी भी पूरा नहीं कर सकती ।यह बात उन्होंने आज से 70 - 80 साल पहले कही थी और जब हम आज देखते हैं तो उनकी बात कितनी सच लगती है ।  आज विकास के नाम पर प्रकृति का इस कदर दोहन हो रहा है कि वह लगभग विनाश के कगार पर है।तो यह उनके जीवन की एक ख़ास विशेषता थी कि उनके भीतर लालच था ही नहीं, अति न्यूनता में गुजारा करना , अति साधारणता में जनहितैषी जीवन जीना ही उनके जीवन का उद्देश्य था । अपने जीवन शैली में उन्होंने कभी भी, किसी भी मनुष्य के लिए अपने व्यवहार में हिंसा को जगह नहीं दी जबकि आम मनुष्य आए दिन अपने व्यवहार में हिंसा के विभिन्न तरीकों को जाने अनजाने अपनाता  रहता है।ऐसे कुछ उदाहरण मिलते हैं कि गांधी ने अपने शरीर से वस्त्र उतारकर जरूरतमंद को दान कर दिया।  तो यह जो उनके भीतर त्याग की भावना है , दया ,करूणा और प्रेम की भावना है, दरअसल ये सैद्धांतिक और आदर्श की बातें न होकर उनके भीतर के व्यवहारिक पक्ष को दिखाता है कि गांधी अपने जीवन में बहुत प्रेक्टिकल थे।  तो जब तक हम गांधी के इस व्यवहारिक और प्रेक्टिकल आधारित जीवन शैली पर बातचीत नहीं करेंगे तो चर्चा अधूरी रहेगी और बातें ठीक से संप्रेषित नहीं हो पाएंगी।  

गांधी दर्शन को और अधिक सुस्पष्ट तरीके से समझने बूझने के लिए मैं हिन्दी साहित्य के माध्यम से अपनी कुछ बातें रखने की कोशिश करूंगा।  साहित्य में मूलतः हमें दो प्रकार के दर्शन मिलते हैं , एक तो मार्क्सवादी दर्शन और दूसरा गांधी दर्शन।  इन दोनों ही दर्शन के बुनियादी फर्क को एक दूसरे के सापेक्ष जानने समझने की कोशिश करते हुए  कुछ बातें जो मुझे समझ में आती हैं वे यह हैं कि गांधी के दर्शन में कहीं भी उग्रता नजर नहीं आती।  एक कोमलता और करूणा से रचा पगा स्वर उनके दर्शन में उभरता है।  उनके दर्शन में उस तरह के संघर्ष का स्वर कहीं नहीं है जिससे हिंसा की संभावना निर्मित हो। जबकि मार्क्स के दर्शन में यह बात सामने आती है कि दुनियां के जितने शोषित पीड़ित वर्ग हैं वे एकजुट होकर शोषक वर्ग के खिलाफ अपने संघर्ष के स्वर को मुखरित करें ।  उनके दर्शन में उग्रता का भाव कहीं न कहीं ध्वनित होता है। याने मार्क्सवादी दर्शन शोषकों के खिलाफ संघर्ष के स्वर को बहुत सघन रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करता है  और जहां इस तरह के संघर्ष की स्थिति निर्मित होती है वहां कुछ न कुछ हिंसा की संभावना भी बनने लगती है।  तो गांधी और मार्क्सवादी दर्शन में ये मूल फर्क है , हाँ ये जरूर है कि दोनों ही दर्शन में शोषित पीड़ित लोगों के लिए संरक्षण का भाव है जो उन्हें करीब लाता है और हिन्दी साहित्य में कई जगह ये एकाकार होने भी लगते हैं।

मैं इसे और स्पष्ट करने के लिए जैनेन्द्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पर कुछ बातें कहना चाहूँगा।  यह कहानी मध्य वर्ग के चरित्र को एक नए रूप में देखने समझने का एक अवसर हमें देती है।  इस कहानी में मध्य वर्ग का जो चरित्र है वह बहुत विश्वसनीय नहीं है।   गांधी दर्शन को इस कहानी में इसलिए भी हम देखने समझने की कोशिश करेंगे। इस कहानी में नैनीताल का दृश्य है। सर्दी के मौसम में शाम से लेकर रात के दृश्य हैं जब एक छोटा बच्चा मैले कुचैले कपड़ों में सर्दी और भूख से ठिठुरते हुए लेखक को रास्ते में मिलता है। लेखक को उस पर दया आती है , लेखक के एक मित्र वकील साहब भी उस वक्त उनके साथ होते हैं , दोनों में उस बालक को लेकर बातचीत भी होती है।  लेखक अपने मित्र से कहते हैं कि वकील साहब इस बच्चे को आप नौकर क्यों नहीं रख लेते , तो उनके मित्र कहते हैं कि अरे .... ग़रीबों का क्या भरोसा ... कल को ये चोरी भी कर सकता है।  इस बातचीत के उपरान्त भारी सर्दी के मौसम के बीच वे रात में अपने होटल चले जाते हैं।  सुबह जब वे जागते हैं तो कहीं से उन्हें खबर मिलती है कि एक बच्चा मरा पड़ा है।लेखक के मन में रात को सोते समय ये विचार उठते हैं कि इस बच्चे की हमें कुछ न कुछ सहायता करनी थी।   किन्तु सुबह जब उस बच्चे के मरने की खबर आती है तो लेखक को थोड़ा पछतावा होता है कि हम लोग चाहकर भी उसकी कोई सहायता नहीं कर सके। लेखक आगे कहते हैं कि अपना अपना भाग्य है , हर आदमी अपना भाग्य लेकर आता है उसके अनुसार ही उसका जीवन सम्पूर्ण होता है। इस कहानी में लेखक अपने माध्यम से एक द्वन्द प्रस्तुत करते हैं , यही द्वन्द आज के मध्य वर्ग पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है और इस सवाल में ही गांधी दर्शन के कई तत्व छिपे हुए हैं।  मसलन जो शोषित पीड़ित वर्ग है उस वर्ग की हमें सचमुच में कोई सहायता करते हुए दिखना चाहिए।उसे संदिग्ध नजरों से नहीं देखना चाहिए।  यह कहानी मनुष्य के नकली त्याग की भावना पर , उसके स्वार्थीपन पर, समाज के प्रति मनुष्य का एक जो दायित्व है उस दायित्व को पूरा न करने पर  सवाल खड़ा करती है और ऐसे समय गांधी अपने मानवीय दर्शन के साथ  हमारे सामने आ खड़े होते हैं। उच्च या मध्य वर्ग द्वारा निम्न वर्ग पर चोरी करने जैसी सम्भावना के आरोप जिस तरह मढ़  दिए जाते हैं उस प्रवृति पर यह कहानी सोचने पर विवश करती हुई हमें गांधी दर्शन के बहुत करीब ले जाती है।  

मंटो की एक कहानी है करामात। इस कहानी में जैसा कि एक गाँव में लोगों द्वारा चोरी का माल लूटकर अपने घरों में रखा गया होता है , और उसी सिलसिले में पुलिस का आना होता है। पुलिस के आते ही लोग अपने घरों में रखे लूट के सामानों को इधर उधर फेंकने लगते हैं। एक आदमी के पास दो शक्कर की बोरियां होती हैं जो कि लूट कर लाया गया होता है।  उस शक्कर को फेंकने में जब उसे परेशानी होती है तब उन बोरियों को पास के कुँए में वह डालने की कोशिश करता है।  पहली बोरी डाल लेने के बाद जब वह अफरा तफरी के बीच दूसरी बोरी डालने लगता है तो खुद कुँए में गिर जाता है और उसकी मौत हो जाती है।  कुँए के पास भीड़ जमा हो जाती है फिर उसे निकाला जाता है और कब्र में दफना दिया जाता है।दूसरे दिन जब उस कुँए से पानी निकाला जाता है तो उसका पानी मीठा होता है। पानी के मीठे हो जाने को लोगों द्वारा एक चमत्कार मान लिया जाता है, गोया उस दिव्य पुरूष के कुँए में गिरने से ही यह चमत्कार हुआ हो।  लोग उस मृत आदमी को दिव्य पुरूष मान लेते हैं और उसकी कब्र पर दिए जलाते हैं।अंधविश्वास पर प्रश्न को लें तो मार्क्सवादी दर्शन के करीब हम पहुँचते हैं और चोरी करना पाप है, उसका अंत बुरा ही होता है इस पर यदि विचार करें तो हमें गांधी याद आने लगते हैं। इस तरह गांधी और मार्क्स एक साथ यहाँ खड़े नजर आते हैं।

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