सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ग्राम उत्थान, सामाजिक समरसता,लोकचेतना और गांधी जी का शिक्षा दर्शन

गांधी जी के शैक्षिक दर्शन में जाने से पूर्व उनके मूल दर्शन को समझने की कोशिश  करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि उनका उद्देश्य अंग्रेजों की राजनैतिक दासता से मुक्ति के साथ साथ स्वतंत्रता के उपरान्त देशज परम्पराओं का नवीनीकरण करते हुए शैक्षिक , नैतिक , आर्थिक ,आध्यात्मिक स्तर पर भी देश को प्रगति के पथ पर ले जाना था, इसके केंद्र में ग्राम उत्थान उनका प्रमुक्ष ध्येय था। स्वतंत्रता आन्दोलन के समूचे इतिहास पर नजर डालें और उसका एक सम्यक विवेचन करें तो यह बात ध्यातब्य है कि जहां अन्य लोग हिंसा /अहिंसा किसी भी  साधन के माध्यम से जहां केवल और केवल अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहते थे वहीं गांधी की दृष्टि उनसे कहीं ब्यापक थी । वे स्वतंत्रता के साथ साथ उस स्वतंत्रता के मूल्यों की रक्षा हेतु लोकसमाज में शैक्षिक , नैतिक , आर्थिक ,आध्यात्मिक स्तर पर एक पूर्व तैयारी भी चाहते थे ताकि देश में जब पुनर्सृजन की कहानी लिखी जाए तो ये पूर्व तैयारियां देश की उन्नति के लिए लिखी गई उस कहानी को पुख्ता करें । उनकी यह दृष्टि ही उन्हें दूसरों से अलग करती है।

गांधी इस बात को जानते थे कि किसी भी देश और उसकी समाज ब्यवस्था के सुसंचालन के लिए लोक विचार और लोकचेतना की जड़ों का मजबूत होना कितना अहम् है और उनकी नजर में इन जडों को मजबूत करने की शक्ति केवल लोक शिक्षा में है ।गांधी की नजर से देखें तो शिक्षा वह अमोघ अस्त्र है जो अक्षर-ज्ञान से आगे बढ़कर अपने देश-समाज की परम्पराओं, जीवन-बोध और जीवन-मूल्यों का अभिज्ञान कराते हुए उसके अनुरूप राष्ट्रोत्थान एवं समाजोत्थान की दिशा में लोगों को जागरूक एवं सक्रिय  करता है। 

लेकिन अंग्रेजों ने अपने शासन-तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए यहाँ पर एक ऐसी शिक्षा पद्धति की नींव रखी जो शिक्षित वर्ग को लोकजीवन से विमुख करने वाली थी और जिसके माध्यम से यह शिक्षित वर्ग अंग्रेजों के अधीनस्थ काम करने को प्रेरित भी हुआ । उस दरमियान परिस्थितियाँ भी ऎसी बनीं कि राजा राम मोहन राय जैसे जानकार और देश में गहरी आस्था रखने वाले लोग अंग्रेजी शिक्षा के इस अँधेरे पक्ष को भांप नहीं सके  और देश की प्रगति के लिए इस शिक्षा पद्धति को आवश्यक समझ लिया । उसके बाद के कतिपय भारतीय बुद्धिजीवी भी इस अंग्रेजी शिक्षा की वकालत में खड़े होते गये। 

वह समय भी आया जब मैकाले की इस अंग्रेजी शिक्षा की बुराईयाँ दिखने लगीं और उसके जन विरोधी चरित्र को पहचानने का कार्य भी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से शुरू होने लगा। ‘बंग-दर्शन’ नाम की पत्रिका में 1878 में बंकिमचंद का ‘लोक शिक्षा’ नाम से जो लेख छपा था, उसमें उन्होंने अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षण के नाम पर दी जाने वाली वैज्ञानिक एवं आधुनिक शिक्षा को अपर्याप्त बताते हुए इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया था कि ‘‘हमारा विश्वास है कि व्याकरण और रेखागणित का ज्ञान मानसिक उन्नत्ति के लिए जरूरी होते हुए भी व्यावहारिक जीवन के मसलों से जूझने में सम्पूर्ण रूप से सहायक नहीं है। हमें लगता है कि इन तथ्यों और मसलों से राममोहन राय से लेकर श्रीमान् फटिकचंद तक पाश्चात्य रंग में रंगे हुए सभी प्रतिष्ठित लोग इससे अवगत नहीं हैं या इसकी उपेक्षा करते आये हैं। …… अंग्रेजी शिक्षा के कारण शिक्षितों और अशिक्षितों के बीच कोई सहानुभति, कोई संवाद नहीं है। शिक्षित समुदाय अशिक्षित समुदाय के दिल की धड़कन को महसूस करने में असमर्थ है। यही नहीं शिक्षित, अशिक्षित की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखते। कृषक राम की अगर खेत जोतते-जोतते थककर मौत भी हो जाती है, तो हमें क्या? कृषक राम कैसे जीवन-यापन करता है, उसकी रूचि क्या है, अॅग्रेजीयत के रंग में रंगे बंगाली युवकों को इन सवालों से कोई मतलब नहीं। कृषकराम भाड़ में जाए, हमें इससे क्या मतलब ?’’

बंकिम चंद के इस कथन से स्पष्ट है कि मैकाले की इस शिक्षा पद्धति ने समाज में विघटन पैदा करना आरम्भ कर दिया था। इस विघटन को गांधी अपनी पैनी नजर से देख रहे थे । जो शिक्षा ग्रामीण लोकजीवन को समृद्ध करने के बजाय उसकी प्रगति में रूकावट पैदा करे वह शिक्षा गांधी की नजर में जनविरोधी शिक्षा थी जो समाज में प्रेम और समरसता लाने के बजाय विभिन्न वर्गों के मध्य खायी पैदा करने का काम कर रही थी ।

बंकिम चंद तो यह मान ही रहे थे कि मैकाले की यह शिक्षा पद्धति जनविरोधी है जो समाज में श्रमिक वर्ग को उपेक्षित करने और एक नया प्रभु वर्ग पैदा करने का कार्य कर रही है | गांधी उसके आगे जाकर इसकी बुराईयों को भांप रहे थे । गांधी की नजर में ऎसी शिक्षा देश को पुनः पुनः गुलामी की ओर ले जाने का एक ऐसा खतरनाक हथियार था जिसका विरोध करना वे जरूरी समझते थे।  

इसके विकल्प के रूप में गांधी ने शिक्षा का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया । उन्होंने तकली और चरखे के माध्यम से शिक्षा को एक नए नवाचार से जोड़कर लोगों के सामने न केवल प्रस्तुत किया बल्कि उसे अपने जीवन में आत्मसात कर इसके लिए जनमानस को इस दिशा में प्रेरित करने का कार्य भी किया। गांधी का यह स्पष्ट मानना था कि जिस दिन भारत के गाँव गरीबी से मुक्त होंगे उस दिन असली स्वराज आएगा। इसी ध्येय  को लेकर शिक्षा में उन्होंने तकली और चरखे को जोड़ा | गांधी की नजर में चरखा न केवल आर्थिक आजादी एवं गरीबी से मुक्ति का प्रतीक है,बल्कि वह अहिंसा, लघु एवं कुटीर उद्योगों की पक्षधरता का भी प्रतीक है । उनका नजरिया इसे लेकर स्पष्ट था कि अगर हर हाथ को काम मिलेगा तो सबके पास अपनी ब्यस्तता और आर्थिक आजादी रहेगी और इसके फलस्वरूप समाज में वैमनस्यता और हिंसा को पाँव पसारने का मौका नहीं मिलेगा । समाज में अगर हिंसा और वैमनस्यता न होगी तो समरसता और प्रेम का विस्तार होगा जिससे देश की प्रगति के नए रास्ते खुलेंगे।

अगर थोड़ा गहरायी में जाकर समझने की कोशिश करें तो गांधी ने तकली और चरखे का आविष्कार तालीम के दो रूप में किया था । तकली और चरखा एक तो बच्चों के सामूहिक खेल का साधन थी और दूसरा प्रारम्भ से ही स्वालंबन का आधार भी थी। गांधी मानते थे कि यदि कर्म प्रधान शिक्षा में चरखे के माध्यम से युवाशक्ति कर्म में लीन रहेगी तो वह एकाग्र रहेगी , अनुशासित रहेगी । गांधी अनुशासन को चरित्र निर्माण की पहली सीढ़ी मानते थे । उनकी नजर में वही शिक्षा कारगर थी जो चरित्र निर्माण करे , उनका नजरिया स्पष्ट था कि चरित्रवान नागरिक स्वावलम्बी और स्वाभिमानी होता है जिनकी देश को हमेशा जरूरत रहती है। शिक्षा में तकली और चरखा के प्रयोग को उसी चरित्र की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में गांधी जी द्वारा देखा गया । देश में गांधी ऎसी चरित्रवान युवा शक्ति चाहते थे जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के आँखों के आंसू पोछ सके।         

गाँधीजी ने अपने शिक्षा दर्शन में सबसे पहले माध्यम के सवाल को महत्वपूर्ण  मानते हुए इस बात पर बल दिया कि भारत के विभिन्न प्रांतों में शिक्षा देने का काम प्रांतीय भाषाओं अर्थात उनकी मातृभाषाओं में किया जाना चाहिए। उनकी नजर में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा के स्थान पर मातृभाषा के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा सहज और स्वाभाविक थी। 

‘इंडियन ओपिनियन’ पत्रिका के 19-8-1910 के अंक में अपने एक आलेख में गांधी ने लिखा था -  

 ‘‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृति पाई जाती है। मानोँ उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता, अर्थात परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति, चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धान्त को भूल जाने का खतरा मोल ले रहे हैं।’’

फरवरी 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में भी उन्होंने देश के उपस्थित गणमान्य लोगों के बीच बगैर किसी संकोच के यह बात कही थी – ‘‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अॅग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। ….. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा । हमारी भाषा ही हमारा प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझ से यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्त किये ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार से उठ जाना ही अच्छा है। …… यदि पिछले पचास वर्षों में हमें देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती, तो आज हम किस स्थिति में होते ! हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना  जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’’

मातृभाषा में शिक्षा को लेकर वे लगातार देश में सक्रिय रहे। जगह जगह उन्होंने इस हेतु लोगों को जागृत किया। 15 अक्टूबर 1917 को बिहार के भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में भाषण देते  हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था – ‘‘मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वदेश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं जिनमें हमारे ऊँचे विचार प्रकट किये जा सकें। किन्तु यह कोई भाषा का दोष नहीं। भाषा को बनाना और बढ़ाना हमारा अपना ही कर्तव्य है। एक समय ऐसा था जब अंग्रेजी भाषा की भी यही हालत थी। अंग्रेजी का विकास इसलिए हुआ कि अंग्रेज आगे बढ़े और उन्होंने भाषा की उन्नति की। यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सके और हमारा यह सिद्धान्त रहे कि अंग्रेजी के जरिये ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं, तो इसमें जरा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए गुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।’’

एक अन्य अवसर पर गाँधी जी ने विदेशी भाषा द्वारा दी जाने वाली शिक्षा से होने वाली हानियों का उल्लेख करते हुए कहा था  – ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियाँ भी होती है। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधरण को नहीं पहचानते। जनसाधरण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। यदि यही स्थिति अधिक समय तक रही तो एक दिन लार्ड कर्जन का यह आरोप सही हो जाएगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’

गांधी किताबी ज्ञान से अधिक कर्म और अनुभव आधारित ज्ञान को अधिक महत्त्व देते थे । अक्षर-ज्ञान की तुलना में हाथ की शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने कहा था - ‘‘मेरी राय में तो इस देश में, जहाँ लाखों आदमी भूखों मरते हैं, बुद्धिपूर्वक किया जाने वाला श्रम ही सच्ची प्राथमिक शिक्षा या प्रौढ़ शिक्षा है। …. अक्षर-ज्ञान हाथ की शिक्षा के बाद आना चाहिए। हाथ से काम करने की क्षमता – हस्त-कौशल ही तो वह चीज है, जो मनुष्य को पशु से अलग करती है। लिखना-पढ़ना जाने बिना मनुष्य का सम्पूर्ण विकास नहीं हो सकता, ऐसा मानना एक वहम ही है। इसमें कोई शक नहीं कि अक्षर-ज्ञान से जीवन का सौंदर्य बढ़ जाता है, लेकिन यह बात गलत है कि उसके बिना मनुष्य का नैतिक, शारीरिक और आर्थिक विकास हो ही नहीं सकता (हरिजन-सेवक 15-03-1935)।

आज तमाम शिक्षाविदों , बुद्धीजीवियों ,लेखकों और समाजकर्मियों के लिए यह सोचने का बिषय है कि कंप्यूटर को तकली और चरखे का विकल्प बनाकर क्या आज की शिक्षा भारत को एक चरित्रवान और सामाजिक समरसता वाला देश बना पा रही है ?

आज शिक्षा में कंप्यूटर और सूचना तकनीक ने भले ही काम और प्रगति के नए रास्ते खोले हैं पर इस नए अनुप्रयोग ने हमारी शान्ति, हमारी सामाजिक समरसता, हमारे चरित्र और सनातन मूल्यों को तहस नहस अधिक किया है । सायबर अपराध और हिंसा इसी तकनीक की देन कहें तो गलत न होगा । सोते जागते मन की जो शान्ति मनुष्य के लिए जरूरी है वह एक तरह से छीन गयी है । मनुष्य अनेक रोगों से अधिक ग्रस्त हुआ है। 

शिक्षा में लोक की खुशहाली के लिए जिन आर्थिक आजादी और जीवन मूल्यों को लेकर गांधी जी ने अपने शिक्षा दर्शन में एक सपना देखा था वह भले ही आज अधूरा है और एक सपने की तरह हमें लगता है पर एक दिन ऐसा आएगा कि उधर हमें लौटना ही पड़ेगा । शिक्षा में गांधी का दर्शन भले ही आज हास्यास्पद लगे पर एक दिन ऐसा आएगा कि यही हमारे लिए अंतिम विकल्प होगा।

--------------------------------------------------------

रमेश शर्मा , 92 श्रीकुंज, बोईरदादर, रायगढ़ [छत्तीसगढ़]

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

मलकानगिरी यात्रा संस्मरण: बीहड़ जंगलों के बीच गुजरते हुए लगा जैसे यात्राएं भी जीवन की कहानियाँ सुनाती हैं

रायगढ़ से निकल कर हम ओड़िशा के एक ऐसे शहर में पहुंचे थे जिसे माल्यवंत गिरी के नाम से जाना जाता रहा है ।अब इस शहर का नाम मलकानगिरी है । कोरापुट जिले से अलग होकर नए जिले के रूप में इसकी खुद की पहचान अब तेजी से बन रही है। छत्तीसगढ़ और आंध्रा के बॉर्डर इलाके में स्थित माओवादी इलाके के रूप में जो इसकी खुद की पहचान अब तक रही थी , तेजी से विकसित हो रहे इस शहर ने उस पहचान को एक तरह से अब धूमिल किया है। अब यह शहर तेजी से मुख्यधारा की ओर बढ़ने लगा है। हरी-भरी सुंदर पहाड़ियों की गोद में बसा यह शहर अपने शुद्ध पर्यावरण के लिए भी लोगों का पसंदीदा शहर बनता जा रहा है। यहां का सतिगुड़ा डैम और चित्रकुंडा डैम पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं। अगस्त माह के बारिश के दिनों में जब हम यहां कुछ समय के लिए रुके थे तो घनी पहाड़ियों की वजह से जब चाहे बारिश हो जाया करती थी। शहर से पांच किलोमीटर दूर सतीगुड़ा डैम में टहलते हुए हमें लग रहा था कि हरी-भरी वादियों और अथाह जल सागर की गोद में हम आ बैठे हैं।यद्यपि डेम तक पहुंचने का रास्ता बारिश के कारण अस्त व्यस्त सा है पर वहां पहुंचने के बाद हरी भरी वादियों की खूबसूरत...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

विष्णु खरे की पुण्य तिथि पर उनकी कविता "जो मार खा रोईं नहीं" का पुनर्पाठ

विष्णु खरे जी की यह कविता सालों पहले उनके कविता संग्रह से पढ़ी थी। अच्छी  कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं तो भीतर भी उतर जाती हैं। उनमें से यह भी एक है। कविता के भीतर पसरे भाव को पिता के नज़रिए से देखूं या मासूम बेटियों के नज़रिए से,दोनों ही दिशाओं से चलकर आता प्रेम एक उम्मीद  जगाता है।अपने मासूम बेटियों को डांटते ,पीटते हुए पिता पर मन में आक्रोश उत्पन्न नहीं होता। उस अजन्मे आक्रोश को बेटियों के चेहरों पर जन्मे भाव जन्म लेने से पहले ही रोक देते हैं। प्रेम और करुणा से भरी इस सहज सी कविता में मानवीय चिंता का एक नैसर्गिक भाव उभरकर आता है।कोई सहज कविता जब मन को असहज करने लगती है तो समझिए कि वही बड़ी कविता है।  आज पुण्य तिथि पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि ! जो मार खा रोईं नहीं  【विष्णु खरे】 ----------------------------- तिलक मार्ग थाने के सामने जो बिजली का एक बड़ा बक्‍स है उसके पीछे नाली पर बनी झुग्‍गी का वाक़या है यह चालीस के क़रीब उम्र का बाप सूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ नाराज़ हो रहा था अपनी पांच साल और सवा साल की बे...

गजेंद्र रावत की कहानी : उड़न छू

गजेंद्र रावत की कहानी उड़न छू कोरोना काल के उस दहशतजदा माहौल को फिर से आंखों के सामने खींच लाती है जिसे अमूमन हम सभी अपने जीवन में घटित होते देखना नहीं चाहते। अम्मा-रुक्की का जीवन जिसमें एक दंपत्ति के सर्वहारा जीवन के बिंदास लम्हों के साथ साथ एक दहशतजदा संघर्ष भी है वह इस कहानी में दिखाई देता है। कोरोना काल में आम लोगों की पुलिस से लुका छिपी इसलिए भर नहीं होती थी कि वह मार पीट करती थी, बल्कि इसलिए भी होती थी कि वह जेब पर डाका डालने पर भी ऊतारू हो जाती थी। श्रमिक वर्ग में एक तो काम के अभाव में पैसों की तंगी , ऊपर से कहीं मेहनत से दो पैसे किसी तरह मिल जाएं तो रास्ते में पुलिस से उन पैसों को बचाकर घर तक ले आना कोरोना काल की एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी। उस चुनौती को अम्मा ने कैसे स्वीकारा, कैसे जूतों में छिपाकर दो हजार रुपये का नोट उसका बच गया , कैसे मौका देखकर वह उड़न छू होकर घर पहुँच गया, सारी कथाएं यहां समाहित हैं।कहानी में एक लय भी है और पठनीयता भी।कहानी का अंत मन में बहुत उहापोह और कौतूहल पैदा करता है। बहरहाल पूरी कहानी का आनंद तो कहानी को पढ़कर ही लिया जा सकता है।       ...

उदय प्रकाश की कहानी अंतिम नींबू बहुत कुछ कहना चाहती है

इंडिया टुडे के 10 जून 2020 अंक में उदय प्रकाश जी की कहानी अंतिम नींबू पढ़ने का अवसर मिला । कहानी थोड़ी लंबी जरूर है  पर यह अपनी रोचकता में, हर घड़ी बदलती नई-नई परिस्थितियों से उपजे नए नए रहस्यों में ,जो जिज्ञासा उत्पन्न करती है वह इस कहानी की खूबी है। तेजी से बदलती परिस्थितियों के बावजूद हर घटना एक दूसरे से जुड़ी रहकर  कहानी को  एक सूत्र में बांधे रखती है। कहानी में किस्सागोई की ताजगी है, साथ ही भाषाई कलात्मकता और घटित प्रसंगों का चमत्कार भी है। इस कोरोना काल में चीन के वुहान शहर से निकले वायरस का प्रसंग जिस अर्थ और रूप आकार में कहानी में ध्वनित होता है वह पाठक को चमत्कृत करता है। साथ ही विश्व की तमाम राजनीतिक परिस्थितियां ध्वनित होने लगती हैं। एक वायरस जो इन दिनों भाषा के भीतर, हिंसक लोगों के भीतर गाली गलौज के रूप में घुस गया है वह भी उतना ही खतरनाक है जितना की वुहान शहर से निकला वायरस । और यह वायरस जिससे भाषा दिनों दिन मर रही है यह राजनीति की ही देन है । कहानी के अंतिम पैराग्राफ को देखिए जहां सारी बातें स्पष्ट होने लगती हैं- "अगर आप कहीं विनायक दत्तात्रेय को कहीं मास्क ...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

जीवन के पूर्वाद्ध में घटी अच्छी बुरी घटनाओं से मुक्ति और नए रास्तों के पुनर सृजन का संदेश : गोविंद निहलानी की फ़िल्म दृष्टि

बहुत दिनों बाद 1990 में बनी गोविंद निहलानी की फ़िल्म "दृष्टि" दोबारा देखी। इस फ़िल्म को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला हुआ है । डिम्पल कपाड़िया और शेखर कपूर के किरदार, विवाह बन्धनों में बंधे मध्यवर्गीय भारतीय स्त्री-पुरूषों के जीवन की कहानियों को ही साफगोई से अभिब्यक्त करते हैं । स्त्री पुरूषों के पारिवारिक जीवन में घटित हो रही हर घटना/परिघटना को सही नजरिए और खुलेपन के साथ देख पाने की दृष्टि पर केंद्रित यह फ़िल्म वैवाहिक जीवन के एक विमर्श की तरह भी है जो मनुष्य की भीतरी दुनियाँ का खाका भी खींचकर सामने रखती है।  स्त्री पुरुष के वैवाहिक जीवन में न जाने कितने उतार-चढ़ाव, अच्छे बुरे दिन आते जाते रहते हैं। संबंधों को बचाए रखने के लिए न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं।लड़ाई झगड़े ,प्रेम मोहब्बत , नोंक झोंक , मस्ती यायावरी जैसी न जाने कितनी बातें जीवन में होती हैं। ये सब जीवन के विविध रंग हैं जिनसे मिलकर जीवन आकार ग्रहण करता है। कोई भी फिल्म देखिये तो  जीवन के इतने सारे रंगों में से कुछ न कुछ रंग  फिल्म के भीतर दिखाई पड़ जाते हैं । दृष्टि फ़िल्म में भी स्त्री पुरुष के वैवाहिक जीवन स...

चित्रकला प्रतियोगिता में सेंट टेरेसा स्कूल रायगढ़ के कक्षा सातवीं के छात्र आयुष साहू को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 50,000 पचास हजार रूपये का चेक प्रदान किया गया।

रायगढ़ ।  केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय भारत सरकार की देखरेख में ऊर्जा संरक्षण राज्य स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता 27 नवंबर को दुर्ग जिले के कुम्हारी स्थित पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन परिसर में संपन्न हुआ। पेंटिंग कॉम्पटीशन में छत्तीसगढ़ राज्य से विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने भाग लिया। रायगढ़ जिले के सेंट टेरेसा कान्वेंट स्कूल बोईरदादर रायगढ़ के छात्रों की भी इस प्रतियोगिता में सहभागिता रही।इस स्कूल के विद्यार्थियों की कला को समर्पित कल्पना शीलता का उल्लेखनीय प्रदर्शन यहां देखने को मिला।         चित्रकला प्रतियोगिता में सेंट टेरेसा स्कूल रायगढ़ के कक्षा सातवीं के छात्र आयुष साहू को ग्रुप A में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 50,000 पचास हजार रूपये का चेक प्रदान किया गया। इसी स्कूल के विद्यार्थी सुशांत शुक्ला (सातवीं), नावेद अनवर खान (दसवीं), शेख सनाउल्लाह (आठवीं) को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुआ।सांत्वना पुरस्कार के तहत इन तीनों छात्रों में प्रत्येक को 7,500 (सात हजार पांच सौ)रूपये के चेक प्रदान किये गए। स्कूल के चित्रकला शिक्षक तोष कुमार साहू की क...

परिधि को रज़ा फाउंडेशन ने श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र सत्र में बोलने हेतु आमंत्रित किया "युवा 2024" के तहत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में आज है उनका वक्तब्य

परिधि को रज़ा फाउंडेशन ने श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र सत्र में बोलने हेतु आमंत्रित किया "युवा 2024" के तहत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में आज है उनका वक्तब्य रज़ा फाउंडेशन समय समय पर साहित्य एवं कला पर बड़े आयोजन सम्पन्न करता आया है। 27 एवं 28 मार्च को पुरानी पीढ़ी के चुने हुए 9 कवियों धर्मवीर भारती,अजितकुमार, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,विजयदेवनारायण शाही,श्रीकांत वर्मा,कमलेश,रघुवीर सहाय,धूमिल एवं राजकमल चौधरी पर एकाग्र आयोजन रखा गया है।दो दिनों तक चलने वाले 9 सत्रों के इस आयोजन में पांचवा सत्र श्रीकांत वर्मा  पर एकाग्र है जिसमें परिधि शर्मा को बोलने हेतु युवा 2024 के तहत आमंत्रित किया गया है जिसमें वे आज शाम अपना वक्तव्य देंगी। इस आयोजन के सूत्रधार मशहूर कवि आलोचक अशोक वाजपेयी जी हैं जिन्होंने आयोजन के शुरुआत में युवाओं को संबोधित किया।  युवाओं को संबोधित करते हुए अशोक वाजपेयी  कौन हैं सैयद हैदर रज़ा सैयद हैदर रज़ा का जन्म 22 फ़रवरी 1922 को  मध्य प्रदेश के मंडला में हुआ था और उनकी मृत्यु 23 जुलाई 2016 को हुई थी। वे एक प्रतिष्ठित चित्रकार थे। उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल य...