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दैनिक न्यूज़ मेगेज़ीन 'सुबह सवेरे' भोपाल एवम इंदौर एडिशन में प्रकाशित कहानी ■ अधूरी चिठ्ठी , लेखक-रमेश शर्मा

■ अधूरी चिठ्ठी 

-------------------------------------------------------------------सड़क के किनारे अपने कदमों को बढाता हुआ वह चल रहा था । थका-मांदा उदास । मन में विचार आ-जा रहे थे। यह क्रम है कि खत्म ही नहीं हो रहा था । इस अजनबी शहर ने उदासी और हताशा के सिवाय उसे आज तक कुछ दिया ही नहीं। फिर भी यहाँ से जाने को उसका मन आखिर क्यों नहीं होता ? यह एक अजीब सा सवाल था जो चलते-चलते उसके मन में उठने लगा था । वह जाना भी चाहे तो आखिर कहाँ जाए ? जाने के लिए कोई जगह भी तो नियत हो।

उसके मन में उपजे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। जवाब के फेर में पड़े बिना ही वह चला जा रहा था। फरवरी का महीना। आसमान में धूप खिली हुई।एक बात अच्छी घट रही थी कि देह पर पड़ने वाली धूप की आंच देह को भली लग रही थी।सुबह के दस बज रहे होंगे जब इस तरह सडकों पर वह भटक रहा था। 

नज़र उठाकर उसने इधर उधर देखा ....सड़क किनारे रखे कचरे के डिब्बे पर चढ़कर बच्चे खेल रहे थे। उनकी देह पर मैले कुचैले कपड़े न जाने कब से पड़े थे । उनके लिए यह सिर्फ खेल भर नहीं था । खेल के साथ साथ वे अपनी जरूरत की चीजें भी वहां ढूँढ़ रहे थे।उसने गौर से देखा ...एक बच्चा ब्रेड के फेंके गए पेकेट से बचे हुए ब्रेड निकाल कर मुंह में भर रहा था। एक बच्चा कूड़े से बीन बीन कर अपनी जेब में कुछ रखे जा रहा था । एक बच्चे के हाथ में एक बंद लिफाफा था, जो संभवतः उसी कचरे के डिब्बे से उसे मिला था।वह बच्चा बेमन से उसे उलट-पुलट कर देख रहा था । उसके बाल मन ने जब तय कर लिया कि यह लिफाफा उसके किसी काम का नहीं , तब उसने उसे सड़क किनारे ही फेंक दिया । बच्चों की सारी गतिविधियों को कुछ देर खड़े होकर देखने में उसे बेचैनी सी महसूस होने लगी थी । हंगर इंडेक्स के आंकड़े उसकी आँखों के सामने नाचने लगे थे । यूँ ही बेमन से चलते हुए जब फेंका हुआ लिफाफा उसके कदमों के सामने आ गिरा तब उस लिफ़ाफ़े को उठाकर उसने अपने पास रख लिया । उस वक्त इस शहर से ज्यादा इस शहर के लोगों के बारे में वह सोच रहा था।

“ गरीब बच्चे अपनी जरूरत की चीजें कचरे के ढेर पर तलाशते हुए क्यों दीख जाते हैं ?” जब इस सवाल में निहित दृश्य उसकी आँखों के सामने पहली बार दिखायी पड़ा था तब तकरीबन वह दस साल की उम्र का रहा होगा। पिता बहुत पहले दुनिया छोड़ गए थे । तब माँ के हिस्से उसकी सारी जिम्मेदारी थी। यह उन दिनों की घटना थी जब वह अपने कस्बे में रहता था । वह स्कूल जाता और माँ दूसरों के घरों में बर्तन और झाडू पोंछा का काम करती । शाम आते आते वह जब थककर निढाल हो जाती तब वह माँ के पांव दबा देता था। जिन्दगी की बस यही छोटी सी कहानी उनदिनों थी। वह नहीं चाहता था कि उसके जीवन की कहानी बड़ी होकर विस्तारित होने लगे । पर जीवन की कहानी कभी न कभी बड़ी तो हो ही जाती है। कहानी सुख दुःख को साथ लेकर ही विस्तारित होती है । सुख के आने के आसार जीवन में कम थे । जब कहानी बड़ी हुई तो बड़े दुःख ने अनायास जीवन में प्रवेश किया । काम का बोझ ज्यादा रहा या दुःख एवं बीमारी का दंश कि माँ अचानक एक दिन चल बसी । जीवन में अनायास हुए बदलावों ने जीवन की छोटी सी कहानी को एकदम बड़ा बना दिया । जीवन की वह कहानी फिर दिनोंदिन बड़ी होती चली गयी । अनगिनत घटनाएं, अनगिनत प्रसंग । इस कहानी में दस साल की उम्र में आँखों में समाया वह दृश्य अपनी जगह पर आज भी स्थिर है । कभी इस दृश्य का हिस्सा उसे भी बनना पड़ा था, यह सोचकर ही उसके पसीने छूट गए। चलते-चलते एक छाँव वाली जगह पर वह बैठ गया। बच्चे के हाथ से फेंका गया वह लिफाफा अब उसके हाथ में था । उस बिना पता लिखे लिफ़ाफ़े के भीतर रखी चिट्ठी को खोलकर वह अनिच्छा से पढ़ने लगा । यह किसी प्रेमी की चिट्ठी थी जो उसने अपनी प्रेमिका के लिए लिखी थी । पत्र पढ़ते पढ़ते वह भावुक हो रहा था।

'चिठ्ठी लिखी तो है मैंने पर तुम तक पहुँच नहीं सकती!यह अनुपयोगी ही रह जाएगी । तुम इतनी दूर हो चुकीं मुझसे कि कोई डोरी अब तुम्हें मुझसे जोड़ नहीं सकती !' 

आगे चिठ्ठी में आड़ी तिरछी रेखाएं बनी हुई थीं। उन रेखाओं से आसमान में उड़ती हुई एक लड़की का चित्र बन रहा था । उसे एकबारगी महसूस हुआ कि चिट्ठी लिखने वाला कोई चित्रकार रहा होगा । इन चित्रों के ऊपर दाग धब्बे उभर आये थे । दाग धब्बों के लिए जिम्मेदार नमी आँखों की थी या मौसम की , इसके राज उन दाग धब्बों में ही दफन थे। लड़की उसके जीवन से भर दूर हुई थी या इस दुनिया से , उसकी समझ से सारी चीजें परे होती गयीं थीं । चिठ्ठी एक रहस्य और वेदना को लिए लिफ़ाफ़े में कैद होकर कचरे के डिब्बे में फेंकी गयी थी । पहली बार जिस बच्चे ने इस चिठ्ठी को कचरे के डिब्बे से उठाया था संभव है वह भी इसी तरह किसी के द्वारा फेंका गया हो । कचरे के डिब्बों में जीवन ढूँढने वाले बच्चे अक्सर अनाथ ही होते हैं। 

'दुनिया में बहुत सारी चीजें इसी तरह फेंक दी जाती हैं' यह सोचकर ही वह कुछ देर के लिए सहम गया ! चीजें कैसे अनुपयोगी हो जाती हैं , यहां तक बच्चे भी ! चिट्ठी पढ़कर अचानक उसे अपने कस्बे की याद हो आयी । उसका अपना कस्बा भी तो कब का उठाकर उसे फेंक चुका। माँ गयी तो उसका कस्बा भी उसकी हाथ से रेत की तरह फिसल गया । किसी ने उसे पनाह नहीं दी। निष्ठुर लोग और एक निष्ठुर सा कस्बा ! पंद्रह साल का बच्चा अकेले करे तो क्या करे ? पेट की समस्या अलग। फिर एक दिन शहर के स्टेशन से गुजरती छुक छुक करती रेल गाड़ी ने उसे अपनी गोदी में बिठाकर यहाँ पहुंचा दिया । एक तेल मिल के मालिक की नज़र उस पर पड़ी।उसने उसे पनाह दी । शायद इसलिए पनाह दी उसने कि वह उसके काम का निकला । उसके मुनाफे में उसकी भूमिका थी । वह उसे कई बार डांटता, गाली गलौज भी करता। जीने के लिए उसने सहना भी सीख लिया था। जीवन की गाड़ी रेंगती रही धीरे धीरे । वह तो जीवन की कहानी को बहुत छोटा रखना चाहता था पर वह थी कि हर बार बड़ी होती गयी थी । इतने सालों बाद अब यहाँ से भी उसे फेंकने की तैयारी मिल मालिक ने कर ली है । उसने अपना मिल बंद करके कोई ज्यादा मुनाफे का बिजनेस सोच लिया है । वह कह चुका कि उस बिजनेस में उसकी कोई उपयोगिता नहीं । अब अचानक वह उसकी नज़र में अनुपयोगी कचरे में तब्दील हो गया है । आखिर अब वह कहाँ जाए ? कौन सा कस्बा तलाशे? लोग अचानक इतना संवेदनहीन, इतना निष्ठूर कैसे हो जाते हैं ? वह कुछ भी समझ पाने की स्थिति में नहीं था । 

चिठ्ठी पढ़ते और अपने बारे में यह सब सोचते हुए उसे झपकी सी आ गयी थी। उसकी आँखें अचानक खुलीं तो लगा कि वह भी तो एक अधूरी चिठ्ठी की तरह है जिसे समय ने लिखा। समय भी किसी चित्रकार से कम थोड़े ही है । इस चित्रकार की लिखी यह चिठ्ठी किस जगह फेंकी जाएगी और किस बच्चे के हाथ लगेगी , वह कुछ नहीं जानता। वह यह भी नहीं जानता कि    चिठ्ठियों के इस तरह अधूरे रह जाने पर दुनिया में कोई आहत होता भी है या नहीं ।       

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टिप्पणियाँ

  1. अधूरी चिट्ठी , एक अच्छी और सम्वेदन शील कहानी है, हार्दिक बधाई शुभकामनाएं

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