सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दैनिक न्यूज़ मेगेज़ीन 'सुबह सवेरे' भोपाल एवम इंदौर एडिशन में प्रकाशित कहानी ■ अधूरी चिठ्ठी , लेखक-रमेश शर्मा

■ अधूरी चिठ्ठी 

-------------------------------------------------------------------सड़क के किनारे अपने कदमों को बढाता हुआ वह चल रहा था । थका-मांदा उदास । मन में विचार आ-जा रहे थे। यह क्रम है कि खत्म ही नहीं हो रहा था । इस अजनबी शहर ने उदासी और हताशा के सिवाय उसे आज तक कुछ दिया ही नहीं। फिर भी यहाँ से जाने को उसका मन आखिर क्यों नहीं होता ? यह एक अजीब सा सवाल था जो चलते-चलते उसके मन में उठने लगा था । वह जाना भी चाहे तो आखिर कहाँ जाए ? जाने के लिए कोई जगह भी तो नियत हो।

उसके मन में उपजे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। जवाब के फेर में पड़े बिना ही वह चला जा रहा था। फरवरी का महीना। आसमान में धूप खिली हुई।एक बात अच्छी घट रही थी कि देह पर पड़ने वाली धूप की आंच देह को भली लग रही थी।सुबह के दस बज रहे होंगे जब इस तरह सडकों पर वह भटक रहा था। 

नज़र उठाकर उसने इधर उधर देखा ....सड़क किनारे रखे कचरे के डिब्बे पर चढ़कर बच्चे खेल रहे थे। उनकी देह पर मैले कुचैले कपड़े न जाने कब से पड़े थे । उनके लिए यह सिर्फ खेल भर नहीं था । खेल के साथ साथ वे अपनी जरूरत की चीजें भी वहां ढूँढ़ रहे थे।उसने गौर से देखा ...एक बच्चा ब्रेड के फेंके गए पेकेट से बचे हुए ब्रेड निकाल कर मुंह में भर रहा था। एक बच्चा कूड़े से बीन बीन कर अपनी जेब में कुछ रखे जा रहा था । एक बच्चे के हाथ में एक बंद लिफाफा था, जो संभवतः उसी कचरे के डिब्बे से उसे मिला था।वह बच्चा बेमन से उसे उलट-पुलट कर देख रहा था । उसके बाल मन ने जब तय कर लिया कि यह लिफाफा उसके किसी काम का नहीं , तब उसने उसे सड़क किनारे ही फेंक दिया । बच्चों की सारी गतिविधियों को कुछ देर खड़े होकर देखने में उसे बेचैनी सी महसूस होने लगी थी । हंगर इंडेक्स के आंकड़े उसकी आँखों के सामने नाचने लगे थे । यूँ ही बेमन से चलते हुए जब फेंका हुआ लिफाफा उसके कदमों के सामने आ गिरा तब उस लिफ़ाफ़े को उठाकर उसने अपने पास रख लिया । उस वक्त इस शहर से ज्यादा इस शहर के लोगों के बारे में वह सोच रहा था।

“ गरीब बच्चे अपनी जरूरत की चीजें कचरे के ढेर पर तलाशते हुए क्यों दीख जाते हैं ?” जब इस सवाल में निहित दृश्य उसकी आँखों के सामने पहली बार दिखायी पड़ा था तब तकरीबन वह दस साल की उम्र का रहा होगा। पिता बहुत पहले दुनिया छोड़ गए थे । तब माँ के हिस्से उसकी सारी जिम्मेदारी थी। यह उन दिनों की घटना थी जब वह अपने कस्बे में रहता था । वह स्कूल जाता और माँ दूसरों के घरों में बर्तन और झाडू पोंछा का काम करती । शाम आते आते वह जब थककर निढाल हो जाती तब वह माँ के पांव दबा देता था। जिन्दगी की बस यही छोटी सी कहानी उनदिनों थी। वह नहीं चाहता था कि उसके जीवन की कहानी बड़ी होकर विस्तारित होने लगे । पर जीवन की कहानी कभी न कभी बड़ी तो हो ही जाती है। कहानी सुख दुःख को साथ लेकर ही विस्तारित होती है । सुख के आने के आसार जीवन में कम थे । जब कहानी बड़ी हुई तो बड़े दुःख ने अनायास जीवन में प्रवेश किया । काम का बोझ ज्यादा रहा या दुःख एवं बीमारी का दंश कि माँ अचानक एक दिन चल बसी । जीवन में अनायास हुए बदलावों ने जीवन की छोटी सी कहानी को एकदम बड़ा बना दिया । जीवन की वह कहानी फिर दिनोंदिन बड़ी होती चली गयी । अनगिनत घटनाएं, अनगिनत प्रसंग । इस कहानी में दस साल की उम्र में आँखों में समाया वह दृश्य अपनी जगह पर आज भी स्थिर है । कभी इस दृश्य का हिस्सा उसे भी बनना पड़ा था, यह सोचकर ही उसके पसीने छूट गए। चलते-चलते एक छाँव वाली जगह पर वह बैठ गया। बच्चे के हाथ से फेंका गया वह लिफाफा अब उसके हाथ में था । उस बिना पता लिखे लिफ़ाफ़े के भीतर रखी चिट्ठी को खोलकर वह अनिच्छा से पढ़ने लगा । यह किसी प्रेमी की चिट्ठी थी जो उसने अपनी प्रेमिका के लिए लिखी थी । पत्र पढ़ते पढ़ते वह भावुक हो रहा था।

'चिठ्ठी लिखी तो है मैंने पर तुम तक पहुँच नहीं सकती!यह अनुपयोगी ही रह जाएगी । तुम इतनी दूर हो चुकीं मुझसे कि कोई डोरी अब तुम्हें मुझसे जोड़ नहीं सकती !' 

आगे चिठ्ठी में आड़ी तिरछी रेखाएं बनी हुई थीं। उन रेखाओं से आसमान में उड़ती हुई एक लड़की का चित्र बन रहा था । उसे एकबारगी महसूस हुआ कि चिट्ठी लिखने वाला कोई चित्रकार रहा होगा । इन चित्रों के ऊपर दाग धब्बे उभर आये थे । दाग धब्बों के लिए जिम्मेदार नमी आँखों की थी या मौसम की , इसके राज उन दाग धब्बों में ही दफन थे। लड़की उसके जीवन से भर दूर हुई थी या इस दुनिया से , उसकी समझ से सारी चीजें परे होती गयीं थीं । चिठ्ठी एक रहस्य और वेदना को लिए लिफ़ाफ़े में कैद होकर कचरे के डिब्बे में फेंकी गयी थी । पहली बार जिस बच्चे ने इस चिठ्ठी को कचरे के डिब्बे से उठाया था संभव है वह भी इसी तरह किसी के द्वारा फेंका गया हो । कचरे के डिब्बों में जीवन ढूँढने वाले बच्चे अक्सर अनाथ ही होते हैं। 

'दुनिया में बहुत सारी चीजें इसी तरह फेंक दी जाती हैं' यह सोचकर ही वह कुछ देर के लिए सहम गया ! चीजें कैसे अनुपयोगी हो जाती हैं , यहां तक बच्चे भी ! चिट्ठी पढ़कर अचानक उसे अपने कस्बे की याद हो आयी । उसका अपना कस्बा भी तो कब का उठाकर उसे फेंक चुका। माँ गयी तो उसका कस्बा भी उसकी हाथ से रेत की तरह फिसल गया । किसी ने उसे पनाह नहीं दी। निष्ठुर लोग और एक निष्ठुर सा कस्बा ! पंद्रह साल का बच्चा अकेले करे तो क्या करे ? पेट की समस्या अलग। फिर एक दिन शहर के स्टेशन से गुजरती छुक छुक करती रेल गाड़ी ने उसे अपनी गोदी में बिठाकर यहाँ पहुंचा दिया । एक तेल मिल के मालिक की नज़र उस पर पड़ी।उसने उसे पनाह दी । शायद इसलिए पनाह दी उसने कि वह उसके काम का निकला । उसके मुनाफे में उसकी भूमिका थी । वह उसे कई बार डांटता, गाली गलौज भी करता। जीने के लिए उसने सहना भी सीख लिया था। जीवन की गाड़ी रेंगती रही धीरे धीरे । वह तो जीवन की कहानी को बहुत छोटा रखना चाहता था पर वह थी कि हर बार बड़ी होती गयी थी । इतने सालों बाद अब यहाँ से भी उसे फेंकने की तैयारी मिल मालिक ने कर ली है । उसने अपना मिल बंद करके कोई ज्यादा मुनाफे का बिजनेस सोच लिया है । वह कह चुका कि उस बिजनेस में उसकी कोई उपयोगिता नहीं । अब अचानक वह उसकी नज़र में अनुपयोगी कचरे में तब्दील हो गया है । आखिर अब वह कहाँ जाए ? कौन सा कस्बा तलाशे? लोग अचानक इतना संवेदनहीन, इतना निष्ठूर कैसे हो जाते हैं ? वह कुछ भी समझ पाने की स्थिति में नहीं था । 

चिठ्ठी पढ़ते और अपने बारे में यह सब सोचते हुए उसे झपकी सी आ गयी थी। उसकी आँखें अचानक खुलीं तो लगा कि वह भी तो एक अधूरी चिठ्ठी की तरह है जिसे समय ने लिखा। समय भी किसी चित्रकार से कम थोड़े ही है । इस चित्रकार की लिखी यह चिठ्ठी किस जगह फेंकी जाएगी और किस बच्चे के हाथ लगेगी , वह कुछ नहीं जानता। वह यह भी नहीं जानता कि    चिठ्ठियों के इस तरह अधूरे रह जाने पर दुनिया में कोई आहत होता भी है या नहीं ।       

-----------------------------------------------------------

टिप्पणियाँ

  1. अधूरी चिट्ठी , एक अच्छी और सम्वेदन शील कहानी है, हार्दिक बधाई शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

कोइलिघुगर वॉटरफॉल तक की यात्रा रायगढ़ से

    अपने दूर पास की भौगौलिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को जानने समझने के लिए पर्यटन एक आसान रास्ता है । पर्यटन से दैनिक जीवन की एकरसता से जन्मी ऊब भी कुछ समय के लिए मिटने लगती है और हम कुछ हद तक तरोताजा भी महसूस करते हैं । यह ताजगी हमें भीतर से स्वस्थ भी करती है और हम तनाव से दूर होते हैं । रायगढ़ वासियों को पर्यटन करना हो वह भी रायगढ़ के आसपास तो झट से एक नाम याद आता है कोयलीघोघर! कोयलीघोघर ओड़िसा के झारसुगड़ा जिले का एक प्रसिद्द पिकनिक स्पॉट है जहां रायगढ़ से एक घंटे में सड़क मार्ग की यात्रा कर बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है । शोर्ट कट रास्ता अपनाते हुए रायगढ़ से लोइंग, बनोरा, बेलेरिया होते ओड़िसा के बासनपाली गाँव में आप प्रवेश करते हैं फिर वहां से निकल कर भीखमपाली के पूर्व पड़ने वाले एक चौक पर जाकर रायगढ़ झारसुगड़ा मुख्य सड़क को पकड लेते हैं। इस मुख्य सड़क पर चलते हुए भीखम पाली के बाद पचगांव नामक जगह आती है जहाँ खाने पीने की चीजें मिल जाती हैं।  यहाँ के लोकल बने पेड़े बहुत प्रसिद्द हैं जिसका स्वाद कुछ देर रूककर लिया जा सकता है । पचगांव से चलकर आधे घंटे बाद कुरेमाल का ढाबा पड़...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

" रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे?" रमेश शर्मा की चर्चित कहानी

इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

विचारक प्रोफेसर हेमचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण टिप्पणी Hemchandra Pandey on Anugrah

होली और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अनुग्रह के द्वारा आयोजित परिचर्चा  मौजूं , बहुआयामी और मननीय होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण बन पड़ी है।  होली पर गांधीजी की जिस टिप्पणी का उल्लेख आपने किया है वह कुछ ज्यादा कठोर प्रतीत हो सकती है; लेकिन आज, १३२ वर्षों के बाद भी वह टिप्पणी पूरी तरह गलत नहीं है, यह परिचर्चा में सम्मिलित महिलाओं के विचारों और अनुभवों से सिद्ध होता है। यद्यपि उस टिप्पणी की सीमा श्रीमती तुलसी सुकरा के मंतव्य से स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, भारत सांस्कृतिक दृष्टि से इतनी अधिक विविधता वाला देश है कि एक ही त्यौहार विभिन्न स्थानों और अलग अलग सामाजिक श्रेणियों में इतने अधिक भिन्न भिन्न रूपों में मनाया जाता है कि उसके विषय में दोटूक और सपाट व्यक्तव्य दे पाना संभव नहीं है।  परिचर्चा में सम्मिलित लगभग सभी प्रतिभागियों के व्यक्तव्यों में इस कठिनाई की झलक मिलती है। फिर भी, इस कड़वी सच्चाई को झुठलाना तो सत्य से मुंह फेरने जैसा ही होगा कि पितृसत्ता की काली छाया ने होली के सप्तरंगी सुंदर स्वरूप को ढंक रखा है। त्यौहार और पर्व ऐसे अवसर होते हैं जब हम वैयक्तिकता की सं...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...