सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

राजकमल चौधरी सम्मान वरिष्ठ कथाकार शंकर को



दिल्ली। 23 सितंबर 2023।शनिवार। 

साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित राजकमल चौधरी सम्मान इस बार हमारे समय के महत्वपूर्ण, सम्मानित वरिष्ठ कथाकार एवं परिकथा जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के संपादक शंकर जी को प्रदान किया गया । यह आयोजन गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में शनिवार को सम्पन्न हुआ।

मंचस्थ लोगों में अध्यक्ष डाॅ.विश्वनाथ त्रिपाठी, जानकी प्रसाद शर्मा, नीलमाधव चौधरी, राजकुमार शर्मा, पुरस्कृत कथाकार शंकर और हरियश राय थे। मंच का सफल संचालन कथाकार महेश दर्पण ने किया।

आरंभ राजकमल चौधरी की कविताओं से हुआ, जिसका वाचन उनके पुत्र नीलमाधव चौधरी ने किया। इसबार के निर्णायक जानकी प्रसाद शर्मा ने शंकर जी के व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। अमूमन अध्यक्ष का भाषण सबसे आखीर में होता है, लेकिन विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने बीच में ही अपना आशीर्वचन दे दिया और वे चले गए। 92 वर्ष की उम्र में उनका आ जाना ही बङी बात थी। 



वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि शंकर ने अपने रचनाकाल में बहुत से लोगों से बहुत कुछ संग्रह किया है।यह विशेषता शंकर के लेखन को खास बनाती है।तमाम रचनाकारों और घटनाक्रमों से कुछ न कुछ संग्रह करते हुए भी शंकर अपनी रचनाओं में शंकर बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि शंकर की रचनाओं को पढ़ते हुए ना तो शिल्प के बारे में पता चल पाता है और ना ही लेखक की धारणा का।ऐसा करना हर किसी लेखक के बस की बात नहीं है।

गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित इस समारोह में वरिष्ठ आचोलक विश्वनाथ त्रिपाठी, साहित्यकार राजकुमार शर्मा और जानकी प्रसाद शर्मा ने स्मृति चिह्न, अंगवस्त्र और 21,000 रुपये की सम्मान राशि प्रदान करके कहानीकार शंकर को सम्मानित किया।

कथाकार शंकर ने सम्मान पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा कि यह उनके जीवन का पहला पुरस्कार है और इसे पाकर वे गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. अपने लेखन के बारे में शंकर ने कहा कि शुरूआती दिनों में वे चेखव की कहानियों से बहुत प्रभावित हुए।चेखव को पढ़ते हुए उन्होंने तय किया कि वे चेखव की तरह चुस्त कहानी लिखेंगे। रचना को बेवजह विस्तार नहीं देंगे।शंकर ने कहा कि वे उर्दू कहानियों के पाठक रहे हैं।उर्दू कहानियों से उन्होंने भाषा और संवाद की रवानगी को आत्मसाथ किया।मोहन राकेश से उन्होंने रचनाओं में विजुअल पैदा करना सीखा। इस तरह शंकर ने अपनी रचनाओं के लिए चेखव से संक्षिप्ता, उर्दू से भाषा और मोहन राकेश से रचना में दृश्य को सजग करने की कला सीखी।

शंकर की कहानियों पर कथाकार हरियश राय ने विशेष टिप्पणी करते हुए कहा कि वह मौजूदा दौर के एक ऐसे जरूरी रचनाकार हैं जिनसे नई पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है।

अंत में महेश दर्पण ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुए यह कहा कि जो रचेगा वही बचेगा।


कार्यक्रम के बाद बातचीत में मदन कश्यप ने कहा कि कोरोना के बाद अब सबकुछ बदल गया है। अब तो जो बचेगा वही रचेगा। इस अवसर पर  डाॅ.अमरेंद्र मिश्र ने भी अपनी बातें रखीं। डाॅ. अब्दुल बिस्मिल्लाह,  प्रेम तिवारी,  गौरीनाथ, राधेश्याम मंगोलपुरी, नील माधव चौधरी, राकेश रेणु, अशोक मिश्र, आनंदक्राति वर्धन, प्रताप अनम, मुकेशचंद, कमलेश भट्ट कमल, सादतपुर के महेश दर्पण के अलावा रामकुमार कृषक, हीरालाल नागर, निर्दोष त्यागी, राधेश्याम तिवारी, कौशल कुमार आदि भी चर्चा में उपस्थित थे।

राजकमल चौधरी सम्मान और कथाकार शंकर का चयन

कवि-संपादक विष्णु चंद्र शर्मा द्वारा मित्रनिधि के माध्यम से प्रारम्भ किया गया यह सम्मान दो वर्ष के अंतराल में प्रदान किया जाता है।यह सम्मान अब तक इब्बार रब्बी, पंकज बिष्ट और विजेन्द्र को प्रदान किया जा चुका है।

इस बार के निर्णायक वरिष्ठ आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा का कहना था -

"वरिष्ठ कथाकार शंकर विगत पाँच दशकों से सृजनरत हैं। आठवें दशक के साथ शुरूआत करने वाले प्रगतिशील धारा के कहानीकारों में उनका अहम मक़ाम है। अब तक उनके छह कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 1988 में प्रकाशित पहले कहानी-संग्रह 'पहिए' ने  उन्हें एक व्यापक जन सरोकारों के कथाकार के रूप में शिनाख़्त दी। इसके बाद 'मरता हुआ पेड़' (2001), 'जगो देवता जगो' (2019), 'एक बटा एक' (2021), 'बत्तियाँ' (2022) और 'सैल्यूट' (2023) संग्रह प्रकाश में आये। सत्तर के दशक की उनकी आरंभिक कहानियों में प्रतिरोध का जो स्वर विद्यमान है, वह आगे की यात्रा में और प्रखर होता गया है। उनके पास नये बनते हुए सामाजिक यथार्थ की जटिलताओं को समझने की अंतर्दृष्टि है। विशेषतया बदलते हुए कृषि-संबंधों को अपने जाने-पहचाने पात्रों के जीवन के माध्यम से तरजीह देने वाले चंद श्रेष्ठ कहानीकारों में उनका शुमार किया जाता है। एक वस्तुपरक दृष्टि और प्रयोजन के साथ सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य का निरीक्षण और उसकी प्रभावशाली  कलात्मक अभिव्यक्ति उनकी कहानियों की बड़ी विशेषता है। वे अपनी रचनाओं में कथा-कथन के नये प्रयोगों के प्रति स्वयं को खुला रखते हुए कहानी के माध्यमगत वैशिष्ट्य का पूरा ध्यान रखते हैं। निश्चय ही उनके लेखन ने कहानी की सृजन परंपरा में कुछ नये आयामों का इज़ाफ़ा किया है। शंकर के रचनाकार व्यक्तित्व का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे विगत पचास वर्षों से लघु पत्रिका आंदोलन से जुड़े रहे हैं।नियतकालीन और अनियतकालीन सभी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं ने जनतांत्रिक साहित्यिक संस्कृति की फ़िज़ा बनाने में जो योगदान दिया, वह अविस्मरणीय है। इस फ़िज़ा के निर्माण की प्रक्रिया में हमारे समय के अन्य प्रतिबद्ध लेखक-संपादकों की भाँति शंकर की भी अहम भूमिका रही है।"

अनुग्रह की ओर से वरिष्ठ कथाकार शंकर को बधाई।

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

“मेरे सपनों का भारत” में महिला सशक्तिकरण और समानता का संदेश, संचिता गुप्ता ने दी प्रभावशाली प्रस्तुति

“मेरे सपनों का भारत” में महिला सशक्तिकरण और समानता का संदेश, संचिता गुप्ता ने दी प्रभावशाली प्रस्तुति रायगढ़, 1 अक्टूबर 2026। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जामगांव, रायगढ़ की कक्षा 12वीं बायो समूह की होनहार एवं प्रतिभावान छात्रा कु. संचिता गुप्ता ने सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत आयोजित विकासखंड स्तरीय भाषण प्रतियोगिता में सहभागिता करते हुए अपने प्रभावशाली वक्तव्य से सभी का ध्यान आकर्षित किया। नटवर स्कूल, रायगढ़ में आयोजित इस प्रतियोगिता में संचिता गुप्ता ने “मेरे सपनों का भारत” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने अपने भाषण में विकसित, शिक्षित, आत्मनिर्भर और समतामूलक भारत की परिकल्पना रखते हुए शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, रोजगार, सामाजिक समरसता तथा नागरिक जिम्मेदारियों जैसे विषयों पर विचार व्यक्त किए। अपने वक्तव्य में संचिता ने भेदभाव रहित समाज में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और समान अधिकार को भी विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उनके सपनों का भारत ऐसा भारत है, जहां महिलाओं को किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े, उन्हें सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण मिले ...

■जामगांव में संकुल स्तरीय क्विज प्रतियोगिता का आयोजन ■विज्ञान, तकनीक एवं सामान्य अध्ययन के प्रश्नों में विद्यार्थियों ने दिखाया उत्साह; विकासखंड स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होगी संयुक्त टीम

■जामगांव में संकुल स्तरीय क्विज प्रतियोगिता का आयोजन ■विज्ञान, तकनीक एवं सामान्य अध्ययन के प्रश्नों में विद्यार्थियों ने दिखाया उत्साह; विकासखंड स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होगी संयुक्त टीम जामगांव, रायगढ़। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जामगांव में संकुल स्तरीय क्विज प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में संकुल प्राचार्य, संकुल अकादमिक समन्वयक (CAC) तथा संकुल के शिक्षक उपस्थित रहे। आयोजन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में ज्ञान-विज्ञान के प्रति रुचि विकसित करने, तार्किक क्षमता बढ़ाने तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना को प्रोत्साहित करना था। शामिल स्कूल - प्रतियोगिता में शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय कोयलंगा, जामगांव, कुकुर्दा, छुहीपाली एवं नावापारा के विद्यार्थियों ने भाग लिया। प्रश्नोत्तरी में विज्ञान, तकनीक एवं सामान्य अध्ययन से संबंधित प्रश्न शामिल किए गए। विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्नों के उत्तर देकर अपनी ज्ञान क्षमता, तत्परता और प्रतिभा का प्रदर्शन किया। हायर सेकेंडरी स्कूल स्तर पर हुई प्रतियोगिता इसी क्रम में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जामगांव के हायर सेके...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

प्रीति प्रकाश की कहानी : राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए

प्रीति प्रकाश की कहानी 'राम को जन्म भूमि मिलनी चाहिए' को वर्ष 2019-20 का राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान मिला है, इसलिए जाहिर सी बात है कि इस कहानी को पाठक पढ़ना भी चाहते हैं | हमने उनकी लिखित अनुमति से इस कहानी को यहाँ रखा है | कहानी पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि यह कहानी एक संवेदन हीन होते समाज के चरित्र के दोहरेपन, ढोंग और उसके एकतरफा नजरिये को  किस तरह परत दर परत उघाड़ती चली जाती है | समाज की आस्था वायवीय है, वह सच के राम जिसके दर्शन किसी भी बच्चे में हो सकते हैं  , जो साक्षात उनकी आँखों के सामने  दीन हीन अवस्था में पल रहा होता है , उसके प्रति समाज की न कोई आस्था है न कोई जिम्मेदारी है | "समाज की आस्था एकतरफा है और निरा वायवीय भी " यह कहानी इस तथ्य को जबरदस्त तरीके से सामने रखती है | आस्था में एक समग्रता होनी चाहिए कि हम सच के मूर्त राम जो हर बच्चे में मौजूद हैं , और अमूर्त राम जो हमारे ह्रदय में हैं , दोनों के प्रति एक ही नजरिया रखें  | दोनों ही राम को इस धरती पर उनकी जन्म भूमि  मिलनी चाहिए, पर समाज वायवीयता के पीछे जिस तरह भाग रहा है, उस भागम भाग से उपजी संवेदनही...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...

कोइलिघुगर वॉटरफॉल तक की यात्रा रायगढ़ से

    अपने दूर पास की भौगौलिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को जानने समझने के लिए पर्यटन एक आसान रास्ता है । पर्यटन से दैनिक जीवन की एकरसता से जन्मी ऊब भी कुछ समय के लिए मिटने लगती है और हम कुछ हद तक तरोताजा भी महसूस करते हैं । यह ताजगी हमें भीतर से स्वस्थ भी करती है और हम तनाव से दूर होते हैं । रायगढ़ वासियों को पर्यटन करना हो वह भी रायगढ़ के आसपास तो झट से एक नाम याद आता है कोयलीघोघर! कोयलीघोघर ओड़िसा के झारसुगड़ा जिले का एक प्रसिद्द पिकनिक स्पॉट है जहां रायगढ़ से एक घंटे में सड़क मार्ग की यात्रा कर बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है । शोर्ट कट रास्ता अपनाते हुए रायगढ़ से लोइंग, बनोरा, बेलेरिया होते ओड़िसा के बासनपाली गाँव में आप प्रवेश करते हैं फिर वहां से निकल कर भीखमपाली के पूर्व पड़ने वाले एक चौक पर जाकर रायगढ़ झारसुगड़ा मुख्य सड़क को पकड लेते हैं। इस मुख्य सड़क पर चलते हुए भीखम पाली के बाद पचगांव नामक जगह आती है जहाँ खाने पीने की चीजें मिल जाती हैं।  यहाँ के लोकल बने पेड़े बहुत प्रसिद्द हैं जिसका स्वाद कुछ देर रूककर लिया जा सकता है । पचगांव से चलकर आधे घंटे बाद कुरेमाल का ढाबा पड़...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सो...