सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समकालीन हिंदी कहानी में इस बार रमेश शर्मा की कहानी "जो फिर कभी नहीं लौटते"

रमेश शर्मा की कहानी "जो फिर कभी नहीं लौटते"   

रेलवे स्टेशन बहुत छोटा था। यदा-कदा पैसेंजर गाड़ियां ही शायद यहां रुका करती होंगी । रात के ठीक बारह बज रहे थे । ठंड का मौसम था। संयोग से उस दिन उस स्टेशन पर उतरने वाला वह एकमात्र यात्री था । आम तौर पर स्टेशन पर चहल-पहल रहती है पर वह स्टेशन उस वक्त एक सुनसान सी जगह लग रही थी । ठंड के मौसम में स्टेशन मास्टर अपने ऑफिस के कमरे में दुबका हुआ था और सिग्नल दिखाने वाला पोटर स्टेशन के एकदम आखरी छोर पर आग जलाकर ताप रहा था । इस स्टेशन पर इतनी रात उतरे भी कौन ? एक तो एकदम गांव से बाहर ऊपर से गांव तक जाने की कोई सुविधा भी नहीं । वह कुछ देर वहीं सुनसान  प्लेटफॉर्म पर टहलता रहा । उसे देखकर अंधेरे से निकल कर कहीं से दो कुत्ते आकर उस पर भौंकने लगे । कुछ देर के लिए वह डर गया कि कहीं काट न दें । फिर हिम्मत कर, उन्हें भगाने के लिए उसने जोर की आवाज निकाली - "तेरी माँ का भाग स्साले ----!"


वह कुत्तों पर अचानक भारी पड़ गया मानों कुत्ते भी सोच में पड़ गए हों कि इस गालीबाज के कौन मुंह लगे | कुत्ते तो दूर अंधेरे में कहीं दुबक गए पर उसकी आवाज सुनकर पोटर की दिलचस्पी उसमें बढ़ गयी |  

पोटर भी कम गजब आदमी नहीं था, थोड़ा रंगरूट किस्म का, चाहे महिला हो या पुरूष जब भी कोई नया आदमी देखता उसमें उसकी दिलचस्पी बढ़ जाती | इस चक्कर में कई बार वह लोगों की झिड़की खा चुका है, पर कहते हैं ना ... बचपन की आदत जाती नहीं , उसकी यह आदत अब भी बरकरार थी |

 

नए यात्री से मिलने के कौतुहल की वजह से उसका उसके पास आना एक तरह से उसे अच्छा लगा । इस बीच उसने जेब से महंगी सिगरेट निकाल ली थी ।

पोटर ने उसे सर से पांव तक एकटक देखा । उसे लगा कि यह आदमी तो किसी खाते-पीते घर का लग रहा है ।

"आम तौर पर इतनी रात इस स्टेशन पर कभी-कभार ही कोई उतरता है, वह भी तब, जब वह आसपास के गांव का हो, आप तो बाहर के लगते हैं! आपको आखिर जाना कहाँ है ?इतनी रात यहां क्यों उतरे सर ?"--पोटर अपने प्रश्नों के साथ इतना उतावला हो उठा जैसे उसके सामने कोई रहस्य का पर्दा उठने वाला हो |

वह किसी दूसरे मूड में था इसलिए उसकी बातों का जल्दी कुछ जवाब देने के लिए अपने को तैयार नहीं कर सका  । कोई सीधा सा जवाब भी तो उसके पास नहीं था कि दो चार वाक्यों में कह दे । और फिर यह सब बताने के लिए उसे एक लंबी भूमिका बांधने की जरूरत पड़ती जिसके लिए वह कतई तैयार नहीं था |

कोई कुछ पूछे तो उलटे प्रश्न दाग दो, उसे किसी अन्य प्रसंग में उलझा दो | यह उसका पुराना नुस्खा था | उसने इसी नुस्खे का प्रयोग किया |

जवाब देने के बजाय पहले उसने पोटर को सिगरेट ऑफर किया । ठंड बहुत थी, देखकर उसे भी सिगरेट पीने की तलब हो आयी ।

"थैंक यू सर !"-पोटर ने बहुत आत्मीयता के साथ कहा, कहते कहते वही भाव उसके चेहरे भर भी उतर आया |  

नशे की चीजों में भी जादू होता है , इन चीजों का सेवन करने वाले लोग जल्द ही आपस में घुल-मिल जाते हैं । सिगरेट का कश लेता पोटर फिलहाल अपने प्रश्न भूल चुका था ।

वे इधर उधर की बातें करते हुए धुएं का छल्ला उड़ाने लगे थे । इसी दरमियान उल्टे उसने ही पोटर से पूछ लिया - 'तुम्हारे घर में और कौन-कौन हैं?'

"मैं और मेरी माँ"

"तुम्हारी शादी अब तक नहीं हुई?"

"हुई थी , अनबन हो गई । वह छोड़कर कहीं और चली गई ।"

"क्या?"

"हाँ सच कह रहा हूँ ! उसको लगता था कि मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं कर पा रहा हूँ | उसके ख़्वाब बड़े-बड़े थे सर ! इतनी छोटी नौकरी में प्यार के सिवाय मैं उसे ज्यादा और क्या दे सकता था भला !" - धुआँ उड़ाते-उड़ाते वह थोड़ा भावुक हो उठा |

“बच्चे नहीं हैं ?”

“एक बच्ची है दस साल की ,  शहर के साधारण से बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया है!”

“माँ के साथ नहीं गयी ?”

“नहीं ! वह नहीं ले गयी ! कितनी आसानी से एक झटके में कह गयी... यह बाप का जिम्मा है|

"अभी कहाँ है वह?"

"उसने दूसरा मरद बना लिया !” 

"और सिगरेट पिओगे?"

"जी! ठंड बहुत है ।लाईए एक और सुलगाता हूँ ।"

" सिगरेट से मन नहीं भर रहा ! एक एक पैग हो जाता तो मजा आ जाता !"

"अभी संभव नहीं है साहब ! ड्यूटी के टेम ये सब होगा तो नौकरी पर बन आयेगी !" - उसकी असमर्थता अचानक चेहरे पर उतर आयी 

 "कोई बात नहीं ! मेरी सोने की कहीं व्यवस्था करवा दो फिर । सुबह की ट्रेन से मैं वापिस चला जाऊंगा।" -सिगरेट देते-देते उसने प्यार से कहा।

उसे अचरज हुआ कि यह आदमी फिर आया ही क्यों है ? फिर भी उसने उस वक्त उससे कुछ नहीं पूछा,पर भीतर के प्रश्न फिर ज़िंदा हो उठे |

स्टेशन पर ही कोने में कोठरी सी एक जगह थी जिसमें एक चारपाई पड़ी थी । जीरो वाट के बल्ब की रोशनी कमरे में टिमटिमा रही थी, चारपाई पर कब की बिना धुली गोदड़ी पड़ी थी और सिरहाने तकिया और कम्बल भी रखे हुए थे |

"आप सो जाइये आराम से इस बन्द कोठरी में , मुझे तो रात भर ड्यूटी बजानी है ।"-पोटर कमरे को दिखाते हुए जब जाने लगा तो उसने अपने चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लाते हुए फिर एक सवाल दाग दिया- " और कुछ जुगाड़ नहीं है क्या ?"

"क्या साहब आप भी ! ये सब इतना आसान है क्या ?" पोटर उसकी शरारत भरी मुस्कान का अर्थ झट समझ गया 

वह थक गया था । यह कोठरी भी उसे उस वक्त महल की तरह लगने लगी । सोचा उसने ....कम से कम रात तो अब आराम से कट जाएगी । वह इस तरह चित्त सो गया कि सीधे सुबह ही उसकी नींद खुली। नींद में न जाने उसे कितने सपने आते रहे  । वह अब तक बिंदास जीवन जीता आ रहा था | उसे किसी किस्म की जिम्मेदारी उठाने की आदत कभी नहीं रही | पूरे बारह सालों बाद नींद में अब अठ्ठारह की हो चुकी अपनी बेटी के चेहरे की कल्पना करने मात्र से ही वह हतप्रभ और हैरान हो उठा ।

वह सोचता रहा.....पोटर और उसमें कितना फर्क है ! सोचते सोचते एकबारगी वह अपराध बोध से भी भर गया| अगर कोर्ट के फैसले की मजबूरी न होती तो क्या वह इतनी तकलीफें उठाकर अपनी बेटी को लेने आता ? शायद कभी नहीं !

सुबह उठा तो अब भी कमरे में थोड़ा अन्धेरा था | कमरे का जीरो बल्ब टिमटिमा रहा था | उसने गोदड़ी को किनारे सरकाया जहां से फफूंद जैसी हल्की गंध अब भी उठ रही थी | अपनी नाक को छाती के निकट ले जाने से थोड़ी देर के लिए फफूंद की गंध से उसे राहत मिली | वहां अब भी डियो की गंध बची हुई थी जो उसने घर से चलते समय स्प्रे किया था |    

सुबह उठकर सबसे पहले उसका ध्यान उस पोटर को तलाशने पर गया । रात वाला पोटर स्टेशन पर अब कहीं नहीं दिख रहा था। उसकी जगह एक दूसरा पोटर ड्यूटी पर आ गया था । उसके न होने से वह थोड़ा बेचैन हुआ । रात वह कितना घुल-मिल गया था उससे । अभी तो उससे कितनी बातें करनी थी उसे । शहर को वापिसी की ट्रेन दो घण्टे बाद थी ।

वह सोचने लगा "वे लोग भी तो आते ही होंगे अब!"

"क्या वह अपनी बेटी को साथ ले जाएगा ?"

रश्मि से आमना-सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी । सम्भव है रश्मि के साथ भी यही परेशानी हो ।

"जो रिश्ता बारह साल पहले खत्म हो चुका, उस पर अब क्या सोचना !"-वह मन ही मन सोचने लगा ।

अदालती फैसले की वजह से आज बारह साल बाद वह अपनी बेटी की सुपुर्दगी लेने के लिए आया था । कहीं अदालत की अवमानना न हो जाए इस बात का डर था उसे !

उनमें आपस में बात हुई थी कि वह घर को न आए । वह घर जाना भी कहाँ चाहता था | उसकी बेटी अपने नाना के साथ स्टेशन पर ही सुबह मिलने वाली थी उससे ।

वह दबाव में था कि कहीं अगर बेटी सचमुच जाने को तैयार हो गयी तो एक नया झमेला खड़ा हो जाएगा घर में | रीता जो उसकी नयी पत्नी थी क्या स्वीकार कर पाएगी उसे ?वह भी इसके लिए दिल से कहाँ तैयार था | दोनों पति-पत्नी को तो स्वतंत्रता चाहिए थी | रात-बिरात पार्टी से शराब पीकर लौटना उनकी आदत में शामिल था | इसी चाह ने तो उसका पहला संसार छीना था |पहली पत्नी रश्मि उसकी इस स्वच्छन्दता के खिलाफ थी | आधुनिकता की आड़ में उसे नाजायज रिश्ते पसंद नहीं थे | इस बात को लेकर उनमें आपस में झगड़े हुआ करते थे | उसे डर लग रहा था | अब फिर से उसी पुरानी दुनियां के किसी अंश को वह कैसे स्वीकार सकता था ? वह डर और कई प्रकार की आशंकाओं से घिरता जा रहा था |  

स्टेशन पर इंतजार करता हुआ वह जाती हुई मालगाड़ी को एकटक देख रहा था । धुँआ उड़ाती मालगाड़ी भी किस तरह सब कुछ ढोती हुई भागती रहती है पटरी पर ! कभी पटरी से उतरती है तो सारे माल-असबाब किस तरह बिखरकर धरती पर छितर-बितर हो जाते हैं ! फिर उन्हें राह चलते लोग उठाने लगते हैं ।

“लगा उसे जैसे अदालती फैसले के चलते वह भी तो आज उनकी अपनी जीवन की गाड़ी के पटरी से उतर जाने के कारण एक माल असबाब की तरह छितरी पड़ी लड़की को उठाने ही आया है यहां ! भले ही वह उसकी बेटी है पर उससे उसका दिल का तो रिश्ता नहीं रहा कभी !एक बेटी के रूप में क्या वह उसे स्वीकार पाएगा ? एक पिता के रूप में क्या वह उसे स्वीकार पाएगी कभी ?”- एक ज्वार भाटा सा उठ रहा था उसके भीतर !

 

"हम आ गए हैं ! अदालती फैसले के अनुसार आज से शिवानी तुम्हारी जिम्मेदारी हुई ! इसे संभालना और प्यार देना अब तुम्हारे जिम्मे है ।" - अचानक एक बूढ़े की कातर आवाज उसी वक्त उसे असहज और परेशान कर गयी ।

"अदालती फैसले का सम्मान करना जरूरी था । अगर मैं शिवानी को लेने न आता तो मुझ पर यह आरोप भी कल को लगता कि मैंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई । कानूनी फैसले तो अपनी जगह हैं पर फैसले दिल से हों तो मेरा अपना मानना है कि शिवानी के लिए आगे का जीवन आसान होगा । शिवानी चाहे तो मेरे साथ जा सकती है या अपनी माँ रश्मि के बाकी जीवन का सहारा बन सकती है । अगर शिवानी यहां रहना चाहे तो दस लाख रूपये का चेक मैं शिवानी की पढ़ाई लिखाई और अन्य खर्चों के लिए छोड़ना चाहता हूँ ! "- बहुत देर तक चुप रहने के बाद उसने एक ही साँस  में जैसे उनकी ओर एक विकल्प का पासा उछाल दिया था |

 

उस वक्त एक अजीब उहापोह की स्थिति दोनों तरफ थी ।

"बाबूजी रात में नींद ठीक से आई या नहीं ?'-अचानक रात वाले पोटर की आवाज ने इस उहापोह से उसे कुछ समय के लिए बाहर निकाला था जो बिना ड्यूटी के भी उनके पास इस वक्त आ गया था

 

"ये मेरी बेटी है शिवानी ! इसी से मिलने यहां आया था मैं"-उसने हल्का होते हुए इतना भर कहा।

उसकी बातें सुन पोटर अचरज में पड़ गया था । बनते-बिगड़ते रिश्तों का सिरा पकड़ने में उसे थोड़ा समय लगा । अंततः वह सबकुछ समझ गया ।

 

" हो सके तो इसे माँ के पास ही रहने दीजिए बाबूजी ! बिन माँ के बच्चे अनाथ से हो जाते हैं , मैंने देखा है ! भले आप यहाँ आते रहिए , इसमें कोई बुराई नहीं। माँ से बच्चे को अलग करना कानूनी फैसला भले ही होगा पर मेरी नजर में कुदरती फैसला तो कतई नहीं हो सकता !" -पोटर ने एक जज की तरह अपना फैसला सुना दिया था।

पोटर की यह बात उसके लिए संजीवनी बूटी की तरह थी | उसकी भीतरी अमूर्त इच्छा को इससे बल मिला था | मानों पोटर ने उसकी दिली इच्छा को पंख दे दिए थे | इस आरोप से भी वह बच निकला था कि वह बेटी को अपने साथ नहीं ले जाना चाहता |

"तुम ठीक कह रहे हो, शिवानी वहां जाकर बहुत परेशान होगी | मैं भी ब्यस्त रहूँगा तो वह बिलकुल अकेली हो जाएगी, फिर भी अदालती फैसला है क्या करें| उसे तो मैं अपने साथ लेकर  जाउंगा ही!" -- एक भावुक और निश्छल पिता की तरह पोटर की कही गयी बात को हथियार बनाकर बहुत कमीनगी से एक डरावना दृश्य रचते हुए उसने एक नया पासा फेंका मानों वह अपनी बेटी को सचमुच ले जाना चाहता हो |

आदमी के चेहरे के नकली हाव भाव बच्चों को जल्दी समझ में आ जाते हैं | शिवानी समझदार थी | अचानक शहर को जाने वाली गाड़ी के इंजन की व्हिसिल की आवाज जब आने लगी तो शिवानी ने कसकर अपने नाना की हथेलियों को पकड़ लिया ।

यह दृश्य उसे शुकून दे गया | देखकर वह समझ गया कि उसका फेंका हुआ पासा कामयाब रहा, उसे खुशी हुई कि उसे अब अकेले ही लौटना है। बैंक की चेक पर दस्तखत कर उसे शिवानी को थमाते हुए उसके पैर अब डिब्बे के ऊपर जाने लगे ।

"इन पैसों को एहसान मत समझ लीजिएगा पापा ! इन पर मेरा अधिकार था , आगे भी रहेगा !" अब तक चुप रहने वाली शिवानी के बोलते हुए चेहरे में उसे रश्मि दिखने लगी | वह बिल्कुल अपनी माँ पर गयी थी

वह चुप रहा | आगे कुछ कहने की हिम्मत उसकी जाती रही | जाते-जाते उसे लगा जैसे एक अदालती फैसले के बोझ से वह आज मुक्त हुआ है | मुक्ति की खुशी चेहरे से टपक जाने को आतुर हो रही थी | उसके चेहर के भाव बता रहे थे कि उसकी नजरों में एक गैरजरूरी रिश्ते का बोझ भी आज कम हुआ है | वह भीतर से इतना स्वार्थी हो चुका था कि बेटी का साथ छूट जाने का उसे कोई गिला ही नहीं था |

गाड़ी छूटने वाली थी | छूटने के पहले ही शिवानी अपने नाना के साथ ट्रेन की विपरीत दिशा में उस तरफ मुड़ चुकी थी जिधर से वह चलकर आयी थी |

गाड़ी जब चलने लगी तो वह पोटर को हाथ हिलाते हुए मुस्कुराकर कहने लगा  -- " शिवानी का ध्यान रखना ! अगली बार अगर कभी आ सका तो तुम्हें महंगा वाला सिगार पिलाऊंगा !"

अपनी बेटी से विदा होते वक्त भी उसके चेहरे की उन्मुक्तता पोटर को परेशान कर रही थी | दूर जाती रेलगाड़ी के साथ उसका चेहरा भी ओझल होता गया | पोटर को अचानक झटका लगा कि पुनः पीछे मुड़कर लौटने वाले लोगों की संख्या अब दुनियां में दिनोंदिन कम होती जा रही है | 

 

--------------------------------------------------------------------

92 श्रीकुंज, बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

मो.7722975017

    

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

कोइलिघुगर वॉटरफॉल तक की यात्रा रायगढ़ से

    अपने दूर पास की भौगौलिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को जानने समझने के लिए पर्यटन एक आसान रास्ता है । पर्यटन से दैनिक जीवन की एकरसता से जन्मी ऊब भी कुछ समय के लिए मिटने लगती है और हम कुछ हद तक तरोताजा भी महसूस करते हैं । यह ताजगी हमें भीतर से स्वस्थ भी करती है और हम तनाव से दूर होते हैं । रायगढ़ वासियों को पर्यटन करना हो वह भी रायगढ़ के आसपास तो झट से एक नाम याद आता है कोयलीघोघर! कोयलीघोघर ओड़िसा के झारसुगड़ा जिले का एक प्रसिद्द पिकनिक स्पॉट है जहां रायगढ़ से एक घंटे में सड़क मार्ग की यात्रा कर बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है । शोर्ट कट रास्ता अपनाते हुए रायगढ़ से लोइंग, बनोरा, बेलेरिया होते ओड़िसा के बासनपाली गाँव में आप प्रवेश करते हैं फिर वहां से निकल कर भीखमपाली के पूर्व पड़ने वाले एक चौक पर जाकर रायगढ़ झारसुगड़ा मुख्य सड़क को पकड लेते हैं। इस मुख्य सड़क पर चलते हुए भीखम पाली के बाद पचगांव नामक जगह आती है जहाँ खाने पीने की चीजें मिल जाती हैं।  यहाँ के लोकल बने पेड़े बहुत प्रसिद्द हैं जिसका स्वाद कुछ देर रूककर लिया जा सकता है । पचगांव से चलकर आधे घंटे बाद कुरेमाल का ढाबा पड़...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

" रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे?" रमेश शर्मा की चर्चित कहानी

इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

विचारक प्रोफेसर हेमचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण टिप्पणी Hemchandra Pandey on Anugrah

होली और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अनुग्रह के द्वारा आयोजित परिचर्चा  मौजूं , बहुआयामी और मननीय होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण बन पड़ी है।  होली पर गांधीजी की जिस टिप्पणी का उल्लेख आपने किया है वह कुछ ज्यादा कठोर प्रतीत हो सकती है; लेकिन आज, १३२ वर्षों के बाद भी वह टिप्पणी पूरी तरह गलत नहीं है, यह परिचर्चा में सम्मिलित महिलाओं के विचारों और अनुभवों से सिद्ध होता है। यद्यपि उस टिप्पणी की सीमा श्रीमती तुलसी सुकरा के मंतव्य से स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, भारत सांस्कृतिक दृष्टि से इतनी अधिक विविधता वाला देश है कि एक ही त्यौहार विभिन्न स्थानों और अलग अलग सामाजिक श्रेणियों में इतने अधिक भिन्न भिन्न रूपों में मनाया जाता है कि उसके विषय में दोटूक और सपाट व्यक्तव्य दे पाना संभव नहीं है।  परिचर्चा में सम्मिलित लगभग सभी प्रतिभागियों के व्यक्तव्यों में इस कठिनाई की झलक मिलती है। फिर भी, इस कड़वी सच्चाई को झुठलाना तो सत्य से मुंह फेरने जैसा ही होगा कि पितृसत्ता की काली छाया ने होली के सप्तरंगी सुंदर स्वरूप को ढंक रखा है। त्यौहार और पर्व ऐसे अवसर होते हैं जब हम वैयक्तिकता की सं...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...