सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पुस्तक समीक्षा "छोटी आंखों की पुतलियों में" देवेश पथ सारिया की ताइवान डायरी

एक अलहदा अनुभव है छोटी आँखों की पुतलियों से दुनिया को देखना- रमेश शर्मा

ताइवान डायरी 'छोटी आंखों की पुतलियों में' देवेश पथ सारिया

युवा कवि देवेश पथ सरिया की कविताओं को पढ़ने के कई अवसर मेरे हाथ लगे हैं। भौतिक शास्त्र के पोस्ट डॉक्ट्रल फेलो होने के बावजूद हिन्दी साहित्य के प्रति गहरी रूचि और प्रतिबद्ध इमानदारी , मौलिक शैली और गंभीर अभिव्यक्ति के जरिये उन्होंने अपनी कविताओं के लिए एक समृद्ध पाठक वर्ग तैयार किया है। देवेश के भीतर मौजूद गद्यकार को जानने समझने के अवसर अब तक कम मिले, यद्यपि उनकी हाल फिलहाल प्रकाशित एक दो कहानियों के माध्यम से मैंने महसूस किया कि उनके भीतर का यह हुनर भी एक नए आकार में देर सवेर हमारे सामने आएगा और पाठकों को चकित करेगा। हाल ही में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित होकर आयी उनकी ताइवान डायरी की किताब 'छोटी आँखों की पुतलियों से' उनके भीतर मौजूद उसी गद्यकार को थोड़ा और विस्तार देती है । उनके भीतर मौजूद गद्य लेखन का यह हुनर हमें आश्वस्त करता है कि आगे चलकर इस युवा रचनाकार से हमें बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलेगा जो हमारी पाठकीय परिपक्वता को विस्तार देते हुए हमें संतुष्ट करेगा । 

देवेश की ताइवान डायरी 'छोटी आँखों की पुतलियों से' भारतीय उप महाद्वीप से निकल कर चारों तरफ समुद्र से घिरे ताइवान द्वीप की इस तरह सैर कराती है कि इस यात्रा में जैसे हर जगह हम उनके साथ हैं और उनकी आँखों से वहां की संस्कृति और समूची दुनिया को देख समझ रहे हैं | वैचारिक पुष्टता और कलात्मक गद्य के माध्यम से ताइवान की बहुत बारीक़ घटनाओं को अभिव्यक्त करते हुए देवेश जिस तरह बार बार भारतीय घटनाओं से उसे अंतर सम्बंधित करते हैं तब हमें लगता है कि वे अपनी जड़ों में बार बार लौट रहे हैं | उनका अपनी जड़ों की ओर बार बार लौटना बहुत प्रीतिकर और सुखद अनुभवों से हमें भर देता है | ताइवान के किसी भी घटित प्रसंग में भारतीय जीवन का एक उजला कोना साफ़ साफ़ हमें दिखाई देता है जिसे जीते हुए देवेश का ताइवानी जीवन समृद्ध होता हुआ नज़र आता है |

देश के बाहर स्थित एक ऎसी नई जगह जो सात समुन्दर पार हो, वहां जाकर एक नए जीवन की शुरुवात करना अपने आप में किसी नई चुनौती से कम नहीं | डायरी के प्रथम खंड में समाहित 'ताइवान में पहला साल' शीर्षक वाले प्रसंग में जीवन की इस नयी चुनौती के कई कई रंग हैं | भोजन , आवास और नए लोगों से संवाद के लिए दैनिक जद्दोजहद के साथ-साथ दैनिक जीवन में मानव निर्मित बाधाएं यहाँ शिद्दत से विस्तार पाती हैं | यहाँ सरपंच नामकरण के साथ जिस असंतुष्ट और विघ्नकारी पात्र का जिक्र आया है उसका चरित्र चित्रण देवेश ने बहुत रोचकता से किया है | एक ही बिल्डिंग में साथ रहते हुए हर समय टोका टाकी करने वाले इस विघ्न संतोषी पात्र के माध्यम से देवेश इस तथ्य को सामने रखते हैं कि यदि जीवन में किसी बाधा को आप सहजता से स्वीकार करते हैं तब आपकी जीवन यात्रा सहज और संघर्ष प्रबल होने लगता है | ऎसी स्थितियां हरेक के जीवन में कभी न कभी वेश बदल कर आती होंगी पर उन्हें खूबसूरती के साथ सहज रूप में अभिव्यक्त कर पाना सबके बस की बात नहीं | देवेश ने ताइवानी जीवन जीने की उस शुरूवाती संघर्ष को जीवंत रूप में यहाँ प्रस्तुत किया है |

साइकिल निम्न मध्यवर्गीय जीवन का एक ऐसा प्रतीक है जिसके माध्यम से सर्वहारा जीवन की प्रतिछवियां हमारे मन में उभरती हैं | इस प्रतीक के बहाने वे ऎसी घटनाओं का जिक्र करते हैं जिनमें जीवन संघर्ष की कहानियाँ बयाँ होने लगती हैं |वे इस प्रतीक के बहाने इस बात को भली भांति कह पाते हैं कि जीवन में साइकिल की संगत का बने रहना जैसे हर घड़ी जीवन में संघर्ष और गतिशीलता का बने रहना है | 

"जिस आदमी का बचपन साइकिल सुधारने के बहुत देर बाद हैंडपंप से गंदे हाथ धोने में बीता हो वह कहाँ टिश्यू पेपर लेता | वैसे भी वे कालिख को पूरी तरह साफ़ नहीं करते |हाथ गंदे होने का डर रखकर चेन नहीं चढ़ाई जाती|" 

साइकिल वाले प्रसंग में इन पंक्तियों का उल्लेख यहाँ जरूरी लगता है |

अप्रवासी जीवन जीते हुए भी देवेश के भीतर की भारतीयता कभी दूर नहीं होती | 'दो घड़ीसाज' वाले प्रसंग में ताइवानी और भारतीय घड़ीसाज की रोचक तुलना करते हुए भारतीय घड़ीसाज के हुनर को जिस तरह बिना कुछ कहे वे सामने रख देते हैं वहां ताइवानी घड़ीसाज फेलियर साबित होने लगता है |यह समूचा प्रसंग बहुत रोचक रूप में हम तक संप्रेषित होता है |

रचनाकार को समाज के सामने खुद के जीवन मूल्यों की सुरक्षा को लेकर न केवल सचेत रहना चाहिए बल्कि उसे अपने जीवन में घटित घटनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने पाठकों को भी ऐसा करने को प्रेरित करना चाहिए | 'मैं चोर माना जा सकता था' रचनाकार की सतर्कता और जीवन मूल्यों की सुरक्षा को लेकर गहरी प्रतिबद्धता का एक लघु आख्यान ही है जो प्रारंभ में थोड़ा बेचैन करता है फिर मन को शुकून पहुंचाता है |एक रचनाकार को न केवल चेतना संपन्न होना चाहिए बल्कि जीवन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध भी होना चाहिए , देवेश इस तथ्य को बहुत साफगोई से यहाँ रखते हैं |

डायरी लेखन , जीवन के उतार चढ़ाव भरे प्रसंगों को वैचारिक और कलात्मक रूप में शाब्दिक ढांचा देने का एक जीवंत दस्तावेज है | 'अवसाद से बाहर कलात्मक और सामाजिक युक्तियाँ' शीर्षक वाले खंड में कवि लेखक देवेश से इतर उनके जीवन के और भी ऐसे रचनात्मक प्रसंग हैं जो जीवन जीने के कौशलों से संपृक्त हैं और अवसाद की स्थिति में किसी व्यक्ति को रास्ता दिखाने का काम करते हैं | यहाँ उनकी रूस और फ़्रांस की यात्राओं के रोचक प्रसंग हैं जिसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए |

'एंडोस्कोपी दो प्याजा' शीर्षक वाले प्रसंग में खराब स्वास्थ्य और उसके उपचार को लेकर हस्पतालों की ओर दौड़ का जिक्र है | इलाज के दरमियान स्वयं और परिजनों के भीतर बनने वाली मनः स्थितियों से उत्पन्न डर का बहुत बारीक चित्रण यहाँ मिलता है |

'कोरोना काल में ताइवान' वाला प्रसंग भारत के कोरोना काल की याद दिलाता है | भले ही ताइवानी नागरिकों ने कोरोना का दंश न झेला हो पर वहां विभिन्न देशों से कोरोना की विभीषिकाओं की खबरें जिस तरह पहुंचती रहीं और एक दहशत का वातावरण बना रहा, उस दहशतजदा वातावरण का चित्रण देवेश की डायरी में शिद्दत से दर्ज है |

"मेरी यूनिवर्सिटी में बसंत दो बार आता है | पहली बार जब सच में बसंत आता है और तमाम फूलों के साथ सकुरा के फूल खिलते हैं | दूसरी बार जब यूनिवर्सिटी का नया सत्र शुरू होता है | हर साल सितम्बर के महीने में कॉलेज में नए आने वाले ये टीनएजर्स जिन्हें यहाँ फ्रेश मेन कहा जाता है शुरू शुरू में कितने मासूम से दीखते हैं |वैसे इस तरह की मासूमियत भारत में कहीं ज्यादा दिखती है क्योंकि वहां तथाकथित भारतीय वैल्यूज का असर स्कूल तक काफी मजबूत रहता है जो कॉलेज में कदम रखते ही ऐसा काफूर होता है जैसे भरे हुए गुब्बारे को बांधा न गया हो और ऊंगलियों के बीच से एकदम से छोड़ दिया गया हो"

'दूसरा वसंत छठी किश्त' वाले प्रसंग की उपरोक्त पंक्तियाँ देवेश के भीतर मौजूद बारीक विजन की कलात्मक प्रस्तुतियों को हमारे सामने रखती हैं | यह प्रसंग आगे भी उसी रोचकता को विस्तार देता है जो रुचिकर है और पठनीय भी |

डायरी अंश के 'ऑब्जर्वर लड़की' वाले प्रसंग को पढ़ना बहुत प्रीतिकर लगता है | पाठक के तौर पर हमें महसूस होता है जैसे हम कोई कहानी से गुजर रहे हों |इस प्रसंग में बीस साल की एक अलहदा लड़की यंग शन शुन का जिक्र है जो कला की अंडर ग्रेजुएट छात्रा है और कवितायेँ भी लिखा करती है | उससे हुए आत्मिक संवाद के जरिये देवेश लिखते हैं कि यह लड़की अपने चेहरे से लोगों को एक सुन्दर और प्यारी सी लड़की नज़र आती है जबकि लड़की का स्वयं का अनुभव है कि वह भीतर से एक बूढ़े आदमी जैसा महसूस करती है |उसकी कविताओं में भी एक प्रौढ़ और परिपक्व मनुष्य प्रतिबिंबित होता है |यह लड़की लोगों से मित्रता नहीं करती बल्कि उन्हें ऑब्जर्व करती है | वह सोचती है कि अगर वह लोगों से घुल मिल गयी और उनकी बातों का हिस्सा बन गयी तो वह तटस्थ विश्लेषण नहीं कर पाएगी |इस लड़की को लेकर देवेश अपना खुद का अनुभव साझा करते हुए लिखते हैं कि भले ही इस राह पर चलकर दार्शनिक संतुष्टि मिलती हो पर अंत में यह रास्ता अवसाद और अकेलेपन की ओर आदमी को ले जाता है |कोई प्रगाढ़ मित्र न होने के कारण अपने जन्म दिन पर केक न काट पाने वाली इस दार्शनिक सी लड़की को देवेश द्वारा एक सस्ता सा केक भेंट करना अच्छा लगता है जैसे वे उसे इस अवसाद भरे रास्तों से बचाना चाहते हों|

डायरी अंश 'फिजियोथेरेपी दिसम्बर और तीन स्त्रियाँ', 'नववर्ष 2021' में कठिन जीवन संघर्ष के मध्य मिलकर पुनः दूर हो जाने वाले लोगों की खट्टी मीठी स्मृतियाँ , उनसे संवाद के बहुत आत्मीय अनुभवों का जिक्र आता है जिसे पढ़ते हुए यूं लगता है जैसे ये सब हमारे जीवन की भी कहानियाँ हैं |समूची घटनाएं महज विवरणों में न आकर बहुत वैचारिक और कलात्मक रूपों में हम तक पहुंचती हैं इसलिए उनका सम्प्रेषण गहरा है |

डायरी अंश कई बार कहानियों जैसा आभास कराने लगते हैं | ब्लूबेरी क्रम्बल को पढ़ते हुए यही अनुभव होने लगता है जैसे हम कोई कहानी पढ़ रहे हैं | मेरा अपना मानना है कि जीवन में घटित हरेक चीजें कहानी के ही तो अंश हैं| अगर हम उसे कहानी के जरूरी तत्वों के साथ पाठकों तक पहुंचा सकें फिर वे सभी घटनाएं कहानी का एहसास कराने लगती हैं |

किताब के दूसरे खंड में देवेश उन बातों का जिक्र करते हैं जहाँ पाठकों और उनके बीच एक किस्म का खुला संवाद है | रचना प्रक्रिया के दरमियान जिन रास्तों से उन्हें गुजरना पड़ा, जिन युक्तियों का उपयोग करते हुए उन्हें इस राह पर सफलता/असफलता मिली, उन सारी बातों को बड़े आत्मीय भाव के साथ अपने पाठकों के सामने रखने की कोशिश करते हैं | इस राह पर चलते हुए भविष्य में उनके जो भी सपने हैं , मन में जो भी आकांक्षाएं उठती हैं, वे उन्हें भी साझा करते हैं | इन सारी बातों से रचना कर्म की उनकी कठिन साधना को समझा जा सकता है| कविता की साधना , अनुवाद कर्म , कहानी लेखन के साथ डायरी लेखन का यह रास्ता बहुत दुरुह है जिसकी दुरुहता को शनैःशनैः वे लांघते जा रहे हैं जो उनके पाठकों के लिए संतोष का बिषय है |

इस किताब के डायरी अंशों को पढ़ते हुए मेरे मन में इस बात की चिंता जरूर बनी रही कि वे अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ लापरवाह जरूर हैं | वैचारिक दुनिया में डूबकर, रचनाकर्म में तल्लीन होते हुए कई बार रचनाकार को यह लगने लगता है जैसे कि वह बिना देह का है और फिर देह के प्रति लापरवाहियों कि शुरूवात यहीं से होने लगती है | पर चिकित्सकों , हस्पतालों के बीच उनकी आवाजाही के किस्से इतना जरूर आश्वस्त करते हैं कि देह को लेकर उनके भीतर की चेतना जल्द लौटती है और उन्हें हर बार संभाल लेती है |

बस अंत में डायरी अंश की इन खूबसूरत पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात खत्म करता हूँ -


       "ताइवान में चेरी ब्लॉसम के फूल मार्च के अंत तक झड़ चुके होते हैं | उनका झड़ना मेरे लिए त्रासदी की तरह होता है | मैं वर्ष भर फूल खिलने के इन्तजार में उन पेड़ों को देखता रहता हूँ |वर्ष के शेष समय ये पेड़ कभी पत्तों सहित और कभी बिना पत्तों के खड़े रहते हैं |ताइवान में प्राकृतिक सुन्दरता प्रचुर मात्रा में है किन्तु चेरी ब्लॉसम मुझ पर वही असर करता है जो भारत में रह रहे कवियों पर हरसिंगार का होता है|"


किताब : 'छोटी आंखों की पुतलियों से'

लेखक:देवेश पथ सारिया

प्रकाशक :सेतु प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड नोयडा उत्तरप्रदेश

मूल्य: रु.299 , पेपरबेक संस्करण

-->देवेश की कविताएं यहां पढ़ें

----------------------------------------------------



रमेश शर्मा 

92 श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ [छत्तीसगढ़]

फोन: 7722975017

ईमेल: rameshbaba.2010@gmail.com

 

टिप्पणियाँ

  1. सुंदर समीक्षा आपने लिखी है। लेखक और समीक्षक की मेहनत से एक अच्छी किताब के चयन करने का अवसर हिंदी के पाठकों को मिलेगा। बधाई।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

कोइलिघुगर वॉटरफॉल तक की यात्रा रायगढ़ से

    अपने दूर पास की भौगौलिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों को जानने समझने के लिए पर्यटन एक आसान रास्ता है । पर्यटन से दैनिक जीवन की एकरसता से जन्मी ऊब भी कुछ समय के लिए मिटने लगती है और हम कुछ हद तक तरोताजा भी महसूस करते हैं । यह ताजगी हमें भीतर से स्वस्थ भी करती है और हम तनाव से दूर होते हैं । रायगढ़ वासियों को पर्यटन करना हो वह भी रायगढ़ के आसपास तो झट से एक नाम याद आता है कोयलीघोघर! कोयलीघोघर ओड़िसा के झारसुगड़ा जिले का एक प्रसिद्द पिकनिक स्पॉट है जहां रायगढ़ से एक घंटे में सड़क मार्ग की यात्रा कर बहुत आसानी से पहुंचा जा सकता है । शोर्ट कट रास्ता अपनाते हुए रायगढ़ से लोइंग, बनोरा, बेलेरिया होते ओड़िसा के बासनपाली गाँव में आप प्रवेश करते हैं फिर वहां से निकल कर भीखमपाली के पूर्व पड़ने वाले एक चौक पर जाकर रायगढ़ झारसुगड़ा मुख्य सड़क को पकड लेते हैं। इस मुख्य सड़क पर चलते हुए भीखम पाली के बाद पचगांव नामक जगह आती है जहाँ खाने पीने की चीजें मिल जाती हैं।  यहाँ के लोकल बने पेड़े बहुत प्रसिद्द हैं जिसका स्वाद कुछ देर रूककर लिया जा सकता है । पचगांव से चलकर आधे घंटे बाद कुरेमाल का ढाबा पड़...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

" रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे?" रमेश शर्मा की चर्चित कहानी

इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

विचारक प्रोफेसर हेमचंद्र पांडेय की महत्वपूर्ण टिप्पणी Hemchandra Pandey on Anugrah

होली और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अनुग्रह के द्वारा आयोजित परिचर्चा  मौजूं , बहुआयामी और मननीय होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण बन पड़ी है।  होली पर गांधीजी की जिस टिप्पणी का उल्लेख आपने किया है वह कुछ ज्यादा कठोर प्रतीत हो सकती है; लेकिन आज, १३२ वर्षों के बाद भी वह टिप्पणी पूरी तरह गलत नहीं है, यह परिचर्चा में सम्मिलित महिलाओं के विचारों और अनुभवों से सिद्ध होता है। यद्यपि उस टिप्पणी की सीमा श्रीमती तुलसी सुकरा के मंतव्य से स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, भारत सांस्कृतिक दृष्टि से इतनी अधिक विविधता वाला देश है कि एक ही त्यौहार विभिन्न स्थानों और अलग अलग सामाजिक श्रेणियों में इतने अधिक भिन्न भिन्न रूपों में मनाया जाता है कि उसके विषय में दोटूक और सपाट व्यक्तव्य दे पाना संभव नहीं है।  परिचर्चा में सम्मिलित लगभग सभी प्रतिभागियों के व्यक्तव्यों में इस कठिनाई की झलक मिलती है। फिर भी, इस कड़वी सच्चाई को झुठलाना तो सत्य से मुंह फेरने जैसा ही होगा कि पितृसत्ता की काली छाया ने होली के सप्तरंगी सुंदर स्वरूप को ढंक रखा है। त्यौहार और पर्व ऐसे अवसर होते हैं जब हम वैयक्तिकता की सं...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...