सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चम्पारण्य (छत्तीसगढ़) की यात्रा : TRAVEL TO CHAMPARANYA C.G.

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि  चम्पारण्य  champaranya छत्तीसगढ़ का एक प्रसिद्द धार्मिक पर्यटक स्थल है। मेरी स्मृति में यह बात आ रही है कि सन 1991-92 में, मैं वहां तब गया था जब धमतरी के निकट स्थित गाँव पलारी के खुमान प्रसाद आर्य गुरुजी मुझे जोर देकर वहां अपने साथ ले गए थे। उस समय रामायण के प्रसिद्द कथा  वाचक मोरारी बापू चंपारण आये हुए थे और उनकी कथा चल रही थी।उन दिनों मेरी उम्र 23 वर्ष की रही होगी। मुम्बई के बाबू भाई कणकिया ने विशाल क्षेत्र में फैले कथा स्थल में क्लोज सर्किट टीवी की व्यवस्था कर रखी थी। चंपारण की उस भूमि पर आज से तैतीस चौतीस साल पहले के सारे दृश्य अभी भी मेरी स्मृति में जीवंत रूप में विद्यमान हैं । गरमी के दिन थे पर उन दिनों भी वहां चारों तरफ घना जंगल जैसा लुक आता था । हरे भरे विशाल वृक्षों से सुसज्जित चंपारण के मंदिरों वाला कैंपस मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। हाल ही में फरवरी 2021 में वहां मुझे पुनः जाने का अवसर हाथ लगा उस यात्रा को लेकर कुछ संस्मरण सुनने-सुनाने की इच्छा में, आप सबसे साझा करने की मेरी यह एक कोशिश है।


चम्पारण्य का यह प्रसिद्द स्थल मुख्यतः दो घटकों के लिए जाना जाता रहा है और लोग बतौर पर्यटक यहां आते रहे हैं । उन दो घटकों में पहला घटक है चम्पेश्वर महादेव
का मंदिर (champeshvar temple) और दूसरे  घटक के रूप में आते हैं पुष्टि वंश के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी (mahaprabhu vallabhacharya ji)।आध्यात्म के क्षेत्र में पंचकोशी यात्रा का जिक्र आता है । उस पंचकोशी यात्रा में पांच यात्राएं शामिल हैं , वे पांच यात्राएं हैं ..फणेश्वर, चम्पेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, कोपेश्वर और पटेश्वर । देश विदेश से पर्यटक तो यहाँ आते ही हैं उनके साथ साथ पंचकोशी यात्रा में जिनका भी विश्वास है, वे लोग भी पूरी श्रद्धा के साथ यहाँ आते हैं ।

चम्पारण्य नामक गाँव में स्थित यह प्रसिद्द स्थल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 50 किमी दक्षिण पूर्व में एवं राजिम से 15 किमी उत्तर-पूर्व में महानदी के पवित्र त्रिवेणी संगम तट पर स्थित है । यह ऋषि मुनियों की पावन  तपोभूमि भी रही है । लगभग 6 एकड़ में फैले चम्पेश्वर मंदिर वाला यह पवित्र स्थल आज भी बहुत शांत फिजाओं की गोद में है। यद्यपि बदलते समय का प्रभाव यहाँ भी दिखाई जरूर देता है । 34 साल पहले का वह प्राकृतिक सौन्दर्य अब यहाँ उस तरह मौजूद नहीं है जैसे पहले हुआ करता था। पुरानी दुनिया में आए इकोलॉजिकल इफेक्ट को यहां भी हम महसूस करते हैं। एक चीज आज भी यहाँ बची है और वह है यहाँ की स्वच्छता और यहाँ का शांत वातावरण। तपोभूमि होने के कारण शांति को यहाँ अधिक महत्व दिया जाता है। पिछले एक दो दशक के भीतर बने कुछ मंदिरों में आपको वाराणसी के मंदिरो जैसा डिजाइन और वास्तुकला भी यहाँ आपको देखने को मिलेगा।

यहां के लोगों से प्राप्त जानकारी और जनश्रुति के अनुसार चम्पेश्वर मंदिर का भी एक अपना इतिहास है ।

पौराणिक कथा अनुसार 800 वर्ष पूर्व घनघोर जंगल में गांव का एक ग्वाला, गायों को लेकर जंगल की ओर घास चराने के लिए रोज जाता था। एक दिन वह रोज की तरह गांव की सभी गायों को जंगल की तरफ ले गया था  लेकिन जब शाम हो जाने पर गायों को वापस गौशाला के लिए वह ला रहा था, तभी अचानक गायों के झुण्ड में से राधा नामक बांझोली गाय रम्भाती हुई घनघोर जंगल की ओर अचानक भाग निकली । उस वन में पेड़-पौधों की सघनता इतनी अधिक थी कि अगर वहां कोई घुस जाये तो उसे कुछ भी दिखाई न पड़े । राधा नामक बांझोली गाय रोज सुबह-शाम इसी तरह उस घनघोर जंगल में भाग जाया करती थी। ग्वाला की आँखों के सामने ही ऐसा घटित  हुए पूरा एक सप्ताह हो गया। गायों को हर रोज चराने ले जाने वाला ग्वाला सोच में पड़ गया कि आखिर यह गाय रोज जंगल की ओर क्यों भाग जाती हैं।


उसके मन में एक कौतुहल पैदा हो गया कि आखिर माजरा क्या है
? एक दिन वह ग्वाला उसके पीछे पीछे हो लिया। जंगल सघन और घनघोर होने और जगह जगह फैले लता-बेल की वजह से ग्वाले को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए ग्वाला ने देखा कि एक शमी वृक्ष के नीचे खड़ी बांझोली गाय राधा के थनों से दूध की सतत धार एक लिंग के ऊपर गिर रही है। उस ग्वाला ने गांव में जाकर इस घटना के बारे में सबकुछ बताया लेकिन किसी ने उसकी बातों पर यकीन नहीं किया । इस कथन को जांचने के लिए कुछ गांव वालों ने उस ग्वाले को  साथ लेकर घटना स्थल पर जाना सुनिश्चित किया । वहां जाकर उन्होंने देखा कि राधा नामक बांझोली गाय भगवान शिव के लिंग विग्रह पर जिस पर त्रिमूर्ति के रूप में महादेव, माता पार्वती एवं गणेश जी प्रतिबिंबित थे, अपने थनों से दूध की अजस्र धारा गिरा रही थी। इस दृश्य घटना के बाद लोगों द्वारा वहां मंत्रोच्चार और  पूजा आराधना भी की गई। कालांतर में गांव में लोगों ने निर्णय लेकर भगवान महादेव के उस त्रिमूर्ति लिंग स्थल को देवस्थल के रूप में विकसित किया गया । फिर बहुत बाद में झोपडीनुमा मन्दिर के स्थान पर पक्का मंदिर बनाया गया। जो प्राचीन तीर्थ स्थल श्री चम्पेश्वर महादेव मंदिर के नाम से अब प्रसिद्द है ।ग्वाले वाले इस घटना की प्रमाणिकता कितनी है इसके बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता पर लोगों आस्था के इतिहास के नज़रिए से लोग इसे प्रामाणिक मानते हैं ।

यहाँ आने वाले ज्यादातर पर्यटक इस महादेव मंदिर में महानदी का जल चढ़ाते हैं एवं पूजा-अर्चना करते हैं। यह Champeshwar Mahadev temple सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम 3 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है।  

यहाँ की दूसरी कथा महाप्रभु वल्लभाचार्य से जुड़ी है | 15वीं शताब्दी के महान दार्शनिक महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली भी चम्पारण्य ही है । दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के तट पर स्तभाद्रि के निकट स्थित अग्रहार में अगस्त्य मुनि के वंशज कुम्भकार हुए । कालांतर में वे काकखंड में आकर बस गए तथा परिवार सहित तीर्थ यात्रा पर निकल कर काशी पहुंचे।

काशी पर मलेच्छों के आक्रमण के कारण वे सब वापस अपने मूल स्थान की ओर चल पड़े। मार्ग में राजिम नगरी के निकट चम्पारण्य  नामक गाँव में श्री चम्पेश्वर महादेव के दर्शनार्थ वे सब यहाँ पधारे थे। यही महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की माता वल्लमागारु ने संवत 1535 के वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी रविवार (ई. 1479) की रात्रि एक बालक को जन्म दिया। नवजात बालक के जीवित रह पाने की उम्मीद जब कम नज़र आने लगी तब  बालक को उसके माता पिता शमी पेड़ की कोटर में छोड़कर यात्रा में आगे निकल पड़े। फिर व्यग्रता में उन्होंने दूसरे दिन ही वापस आकर बालक को तलाशा तो देखा की स्वयं अग्निदेव ही उस बालक की रक्षा कर रहे हैं। वहां के लोग बताते हैं , इस बालक को चार नाम दिए गए – 1. देवनाम- कृष्ण प्रसाद, 2. मास नाम- जनार्दन, 3. नक्षत्र नाम- श्रविष्ठ, 4. प्रसिद्द नाम वल्लभ। यही बालक आगे चलकर श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य के नाम से प्रसिद्द हुए ।


वल्लभाचार्य बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। लोग उन्हें सरस्वती पुत्र के नाम से भी बुलाते थे । आगे चलकर गुरु विष्णुचित से उन्होंने यजुर्वेद
का ज्ञान लिया । तुरुमल दीक्षित से ऋग्वेद का ज्ञान लिया । अपने पिता से अथर्व वेद व उपनिषदों की शिक्षा उन्होंने ग्रहण की । धार्मिक दृष्टि से भारत में उस समय अनेक मतों का प्रचलन था। श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य ने भागवत पुराण के आधार पर शुध्द द्वैत मतानुसार पुष्टि मार्ग का प्रवर्तन भी किया। महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीनों में  श्री रामानंद जी, कबीर, गुरुनानक देव, श्री रामदास, संत तुकाराम, मीरा बाई , श्री चैतन्य महाप्रभु का नाम आता है ।

श्री कृष्ण के अनन्य भक्त महाप्रभु वल्लभाचार्य ने सम्पूर्ण भारत की तीन बार पैदल यात्रा भी की तथा इस पैदल परिक्रमा के दौरान भागवत सप्ताह का पठन पाठन किया। पैदल भ्रमण के दौरान देश के अनेक जगहों में जहाँ जहाँ भी उन्होंने भागवत का पाठ किया उसे महाप्रभु के बैठक स्थल के रूप में चिन्हित भी किया गया है । इस तरह के 84 बैठक स्थलों का जिक्र धर्म ग्रंथों में मिलता है ।


चम्पारण में भी उनके  दो बैठक स्थल चिन्हित हैं। पहला बैठक स्थल शमी वृक्ष के नीचे उनकी जन्मस्थली पर है तथा दूसरा बैठक स्थल छठी पूजन के स्थान पर स्थित है। यह भी उल्लेखनीय है कि यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। यह जनश्रुति भी प्रचलित है कि वल्लभाचार्य के भक्त यहाँ पर स्थित महानदी को यमुना नदी का रूप मानते हैं।

चूँकि श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने पुष्टि मार्ग की स्थापना की थी इसी कारण यह स्थान वैष्णव संप्रदाय के पुष्टि मार्गीय अनुयायियों का प्रमुख तीर्थ स्थल भी माना जाता है।

प्रत्येक वर्ष वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी को यहाँ मेला भी लगता है। यह दिन वल्लभाचार्य जी का प्राकट्य दिवस है।  उनके जन्म दिन पर आयोजित इस मेले में देश-विदेश के अनेक श्रध्दालु भाग लेते हैं और भव्य रूप में आयोजित  चम्पारण मेले का आनंद उठाते हैं। सावन महीने में भी यहाँ लोगों का खूब आना जाना लगा रहता है। सावन महीने में शिव के भक्तगण चम्पेश्वर महादेव में जल अभिषेक करने हजारों की संख्या में यहाँ आते हैं।


 
चम्पारण्य Champarany में यहाँ के स्थानीय ट्रस्ट द्वारा संचालित साधारण विश्राम गृह भी हैं जहां पर्यटक रूक सकते हैं । भोजन व्यवस्था मंदिर के ट्रस्ट द्वारा लगभग 50 रु. की दर से प्रदान किया जाता है।

यहाँ का निकटतम शहर राजिम है वहां जाकर भी लॉज होटल वगैरह में रूका जा सकता है । अगर अत्याधुनिक होटलों में रूकने की इच्छा हो तो 50 किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर में इसका आनंद लिया जा सकता है।

 

How to Reach – यहाँ पहुंचने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग के माध्यम से बुकिंग भी कराया जा सकता है। चम्पारण्य पहुँचने के लिए सर्वप्रथम आपको छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पहुँचना होगा। रायपुर पहुँचने के लिए निम्न साधनों पर विचार किया जा सकता है

  • वायु मार्ग – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर शहर से 12 किमी की दूरी पर रायपुर का स्वामी विवेकानन्द हवाई अड्डा है जो देश के अधिकाँश शहरों से जुड़ा है। 
  • रेलमार्ग – हावड़ा-मुंबई मुख्य रेलमार्ग पर रायपुर रेलवे स्टेशन स्थित है जहाँ रेल के माध्यम से आप आसानी से पहुँच सकते हैं।
  • सड़क मार्ग – रायपुर शहर से निजी वाहन , कैब अथवा नियमित चलने वाले निजी परिवहन बसों द्वारा चम्पारण्य Champarany तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। 

 -------------------------------------------------

 (चम्पारण्य से लौटकर) 

 

 

 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

" रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे?" रमेश शर्मा की चर्चित कहानी

इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति - वरिष्ठ कथाकार उर्मिला आचार्य का आलेख

  कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति -------------------------------------------------------------------------- -----------------------------------------                                - उर्मिला आचार्य कथा कहानी के इर्द गिर्द रचनाकार की उपस्थिति किस रूप में , किस तरह और कहाँ कहाँ हो सकती है , इसका आकलन करना दिलचस्प होते हुए भी एक दुरूह कार्य है । आकलन न कहते हुए अगर इसे शोध या कोई खोज पूर्ण कार्य कहा जाए तब भी हम इसे सामान्यीकृत नहीं कर रहे होते हैं । कथा लेखन करने के लिए लेखक जिस दुनिया में उतरता है , जिन रास्तों से होकर आगे बढ़ता है , उस दुनिया तक पहुँचने के लिए उन रास्तों से होकर गुजरे बिना हम लेखक का पीछा नहीं कर सकते । यहाँ पीछा करने के अपने निहितार्थ हैं जहाँ से हम लेखक को जानने समझने के लिए उन्हीं रास्तों से होकर गुजरते हैं जहाँ से लेखक अपनी कथायात्रा के साथ आगे बढ़ता है। ...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...

देवेश पथ सारिया की कवितायेँ : कविता संग्रह 'नूह की नाव' से चुनी हुईं कविताओं का पाठ.

दे   वेश पथ सारिया हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवियों में से एक हैं । हाल ही में भारतीय साहित्य अकादेमी  से उनकी कविताओं का एक संग्रह 'नूह की नाव' प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में बहुत सी कवितायेँ मुझे पसंद हैं । उनमें  से चुनी हुई छः कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं.   "देवेश की कविताओं में मूर्तमान होती चीजों में भी एक तरह से अमूर्त सा लगने वाला अति सूक्ष्म विवेचन है जो अमूमन हमारी नज़रों से छूट जाता   है । उन छूटी हुई चीजों से देवेश हमारा परिचय कराते हैं । उनकी कविताओं में चेतन अचेतन रूप में फैले हुए मानवीय जीवन के राग-विराग सह्सा इस तरह आने लगते हैं कि कई बार चकित होना पड़ता है । कवि के पास जीवन और बदलते समय को देखने परखने की एक अलहदा दृष्टि भी है जो इन कविताओं को पुष्ट करती है । उनकी कहन शैली से भी कविताओं में भाषिक सौन्दर्य उत्पन्न होता है"-  रमेश शर्मा   एक पहिये की साइकिल वाला बच्चा एक धूरी पर घूमती है सारी पृथ्वी यह बेहद मामूली लेकिन जरूरी पाठ मुझे फिर से याद आया था उस ताईवानी बच्चे को देखकर जो निकल पड़ा था चिंग हुआ यूनिवर्सिटी की व्...