सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हरिद्वार में 'शांतिकुंज' , सप्तऋषि आश्रम और 'हर की पौड़ी' की परिक्रमा

हरिद्वार का नाम सुनते ही मन में एक आकर्षण पैदा होने लगता है । उत्तराखंड का एक सबसे सुंदर शहर, धार्मिक आस्था का शहर हरिद्वार । जब दिल्ली गए थे तो हम लोग हरिद्वार भी चले गए। उत्कल एक्सप्रेस रायगढ़ से सीधे हरिद्वार ले जाती है ।पर हम बीच में एक रात के लिए दिल्ली रुक गए थे। दूसरे दिन रात को दिल्ली से हमने ट्रेन पकड़ कर हरिद्वार के लिए यात्रा प्रारंभ की और सुबह-सुबह हरिद्वार पहुंच गए। हरिद्वार का रेलवे स्टेशन श्रद्धालु पर्यटकों से भरा हुआ था। गो आईबिबो के माध्यम से हमारी होटल की बुकिंग हो रखी थी, और हम सीधे अपने होटल में चले गए। हमने नहा धोकर थोड़ी देर होटल में विश्राम किया। बाहर निकले तो गलियों में बहुत सारे छोटे-छोटे रेस्टोरेंट हमें मिले। नाश्ता करते हुए लगभग 10 बजे का समय हो गया। फिर थोड़ा टहलते हुए आगे बढ़े और एक ऑटो रिक्शे में हम सीधे शांतिकुंज हरिद्वार के लिए निकल पड़े। वहां गेट पर भीड़ लगी थी , बताया गया कि प्रवेश के लिए आधार कार्ड का होना बहुत जरूरी है। हम अपना आधार कार्ड होटल में ही भूल कर आ गए थे ।

हर की पौड़ी हरिद्वार

उस समय हमें थोड़ी परेशानी महसूस हुई। होटल जाकर फिर से वापस आना संभव नहीं लग रहा था। हमने रायगढ़ फोन लगाया तब पता चला कि रायगढ़ जिले के कुछ लोग यहां स्थाई रूप से शांतिकुंज हरिद्वार में रहते हैं। एक साहू जी का नंबर मिला । उनको मैंने फोन लगाया और अपनी परेशानी बताई, तब वे बाहर निकल कर गेट पर आ गए और उनके माध्यम से हमें अंदर जाने की अनुमति मिल गई। हमने शांतिकुंज हरिद्वार के भीतर बहुत सारी जगहों में जाकर उनका निरीक्षण किया। शांतिकुंज सचमुच में शांति का कुंज है , वहां पहुंचकर हमें जो मानसिक शांति मिली वह अवर्णनीय है। वहां जो सामूहिक भोजनालय है, वहां बैठकर हमने वहां का सादा भोजन भी ग्रहण किया।
बहुत से नए लोगों से बातचीत हुई। शांतिकुंज की व्यवस्था को हमने बहुत करीब से जानने समझने की कोशिश की। उनका खुद का स्कूल है ,उनका खुद का विश्वविद्यालय है, वहां बहुत सारे बच्चे पढ़ते हैं । वहां जो आरती होती है वह अद्वितीय है । लोगों का आपस में मिल जुल कर रहना , पूरी व्यवस्था को संभालना एक अद्भुत तंत्र को स्वमेव संचालित करने जैसा है। बिना त्याग और समर्पण के इस तरह की व्यवस्था संभव नहीं है, जैसा कि वहां हमें देखने के बाद महसूस हुआ। वहां करीब में स्थित एक सप्तऋषि आश्रम में भी घूमते घूमते चले गए । वह आश्रम हमें बहुत सुंदर लगा। उस आश्रम का एक बहुत बड़ा केम्पस है, यहां बहुत से छोटे-छोटे घर बने हुए हैं। इन घरों को कुटिया बोलते हैं जिनमें अलग-अलग ऋषियों के नाम अंकित हैं ।
इन छोटे-छोटे अलग-अलग घरों में रहने के लिए पूरी व्यवस्था है । गर्मियों में आकर लोग यहां महीनों इन छोटे-छोटे घरों को भाड़े में लेकर रहते हैं। इनमें कूलर वगैरा की पूरी व्यवस्था है। केम्पस हरा भरा होने के कारण बहुत सुंदर और मनोहारी लगता है।
वहां से घूम फिर कर हम दोपहर लगभग 3 बजे हर की पौड़ी पहुंच गए।
शांति कुञ्ज हरिद्वार
हर की पौड़ी जिसे हरि की पौड़ी भी कहा जाता है,धार्मिक नगरी हरिद्वार के सर्वाधिक पवित्र स्थलों में से एक है। इस स्थान के बारे में जानना हमें बहुत जरूरी लगा। यह वह स्थान है, जहाँ प्रतिदिन भारत के अलग-अलग जगहों से आए हुए लोगों के दर्शन होते हैं। यहां आए हुए लोगों को देखकर ऐसा लगता है जैसे यह शहर एक लघु भारत में बदल गया है । जानकारी के मुताबिक 'हर की पौड़ी' को 'ब्रह्मकुण्ड' के नाम से भी जाना जाता है। ये माना गया है कि यह वही स्थान है, जहाँ से गंगा नदी पहाड़ों को छोड़कर मैदानी क्षेत्रों की ओर मुड़ती है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर बहती नदी के जल में पापों को धो डालने की अद्भुत शक्ति है । इसलिए यहां आए हुए लोग नदी में जरूर स्नान करते हैं । लोगों की मान्यता है कि यहाँ एक पत्थर में अंकित श्रीहरि के पदचिह्न इस बात का समर्थन करते हैं। यह घाट गंगा नदी की नहर के पश्चिमी तट पर है, जहाँ से नदी उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाती है।
हर की पौड़ी से जुड़ा पौराणिक तथ्य
'हर की पौड़ी' उत्तराखण्ड राज्य की धार्मिक नगरी हरिद्वार का पवित्र और सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इस के भीतर छुपा भाव है- "हरि यानी नारायण के चरण"। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद देवशिल्पी विश्वकर्मा अमृत के कलश को, जिसे पाने के लिए देवता तथा दानवों में घमासान मचा हुआ था,उन सबसे बचाकर ले जा रहे थे। उसी दरमियान भागा भागी में पृथ्वी पर अमृत की कुछ बूँदें कलश से छलक कर गिर गईं । अमृत के छलक कर गिरने की वजह से हरिद्वार में हर की पौड़ी धार्मिक महत्त्व वाला स्थान बन गया। यहाँ पर स्नान करना हरिद्वार आए हर श्रद्धालु की सबसे प्रबल इच्छा होती है, क्योंकि यह माना जाता है कि यहाँ पर स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
हर की पौड़ी हरिद्वार

हर की पौड़ी से जुड़ा मिथक
इस स्थान से संबंधित कई मिथकों में से एक मिथक यह है कि वैदिक काल के दौरान भगवान विष्णु एवं शिव यहाँ प्रकट हुए थे। दूसरे अन्य मिथक अनुसार ब्रह्मा जी जिन्हें सृष्टि का सृजनकर्ता भी कहा जाता है, उन्होंने यहाँ एक यज्ञ किया था। यहाँ के घाट पर कुछ पदचिन्ह भी मौजूद हैं, इन पद चिन्हों के बारे में वहां के पंडितों ने बताया कि ये भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं।
हर की पौड़ी से जुड़ा ऐतिहासिक तथ्य
'हर की पौड़ी' का निर्माण प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य द्वारा करवाया गया था। उन्होंने अपने भाई भतृहरि की याद में इसका निर्माण कराया था। भतृहरि गंगा नदी के घाट पर बैठकर काफ़ी लम्बे समय तक ध्यान किया करते थे।
हर की पौड़ी की धार्मिक मान्यता
हर की पौड़ी में सुबह शाम गंगा जी की आरती होती है। इस आरती में शामिल होना सौभाग्य का विषय इसलिए होता है क्योंकि आप दुनिया के सबसे खूबसूरत दृश्यों में से गिने चुने दृश्यों को उस समय देख रहे होते हैं। हमने भी शाम के समय हर की पौड़ी में उपस्थित रहकर गंगा आरती के दृश्यों का आनंद लिया। आस्था की दृष्टि से भी इसे देखें तो वहां की मौजूदगी एक गहरी संतुष्टि मन को प्रदान करती है ।हमें भी वहां रहकर एक मानसिक शांति मिली और बहुत आनंद का अनुभव हुआ। वहां के पंडित बार-बार इस बात को बताते हैं कि 'हर की पौड़ी' में एक बार डुबकी लगाने पर व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं। लोग बड़ी संख्या में यहाँ कुछ प्रथाओं, जैसे- कि 'मुंडन' एवं 'उपनयन' को पूर्ण करने के लिए भी आते हैं। यह भी एक महत्व का बिषय है कि प्रत्येक 12 वर्ष के पश्चात् यहाँ 'कुंभ मेले' का आयोजन होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों भक्त यहाँ आते हैं।
शांति कुञ्ज हरिद्वार केम्पस में
शाम के समय यहाँ जो महाआरती आयोजित होती है उससे निर्मित गंगा नदी में बहते असंख्य सुनहरे दीपों की आभा बेहद आकर्षक लगती है। शाम को होने वाली गंगा आरती ही हरिद्वार की सबसे अनोखी चीज़ है। हरिद्वार में बहुत सारे मंदिर और आश्रम हैं। जब हर शाम सूर्यास्त के समय साधु, संन्यासी गंगा आरती करते हैं, तब नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया हुआ दिखाई पड़ता है । इस मुख्य घाट के अतिरिक्त यहाँ नहर के किनारे बहुत से छोटे-छोटे घाट हैं जहां लोग नहाते हुए दिखाई पड़ जाते हैं। थोड़े-थोड़े अन्तराल पर ही सन्तरी व सफ़ेद रंग के जीवन रक्षक टावर लगे हुए हैं, जो ये निगरानी रखते हैं कि कहीं कोई श्रद्धालु पर्यटक डूब तो नहीं रहा है।
कश्यप कुटी, सप्तऋषि आश्रम केम्पस में

हमने हर की पौड़ी का खूब आनंद लिया। वहां से निकलकर हम हरिद्वार के सड़कों पर कुछ देर चलते रहे वहां की आबोहवा इतनी सुंदर है कि मन को बहुत शांति मिलती है। हर की पौड़ी में हमारा स्नान तो नहीं हो सका क्योंकि हम वहां दोपहर को पहुंचे थे । यह स्नान हमने अगली बार की यात्रा के लिए रिजर्व कर लिया है यह सोचते हुए रात्रि 8 बजे हम अपने होटल की ओर लौट आए।
लाइक करें
कमेंट करें

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

मलकानगिरी यात्रा संस्मरण: बीहड़ जंगलों के बीच गुजरते हुए लगा जैसे यात्राएं भी जीवन की कहानियाँ सुनाती हैं

रायगढ़ से निकल कर हम ओड़िशा के एक ऐसे शहर में पहुंचे थे जिसे माल्यवंत गिरी के नाम से जाना जाता रहा है ।अब इस शहर का नाम मलकानगिरी है । कोरापुट जिले से अलग होकर नए जिले के रूप में इसकी खुद की पहचान अब तेजी से बन रही है। छत्तीसगढ़ और आंध्रा के बॉर्डर इलाके में स्थित माओवादी इलाके के रूप में जो इसकी खुद की पहचान अब तक रही थी , तेजी से विकसित हो रहे इस शहर ने उस पहचान को एक तरह से अब धूमिल किया है। अब यह शहर तेजी से मुख्यधारा की ओर बढ़ने लगा है। हरी-भरी सुंदर पहाड़ियों की गोद में बसा यह शहर अपने शुद्ध पर्यावरण के लिए भी लोगों का पसंदीदा शहर बनता जा रहा है। यहां का सतिगुड़ा डैम और चित्रकुंडा डैम पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करते हैं। अगस्त माह के बारिश के दिनों में जब हम यहां कुछ समय के लिए रुके थे तो घनी पहाड़ियों की वजह से जब चाहे बारिश हो जाया करती थी। शहर से पांच किलोमीटर दूर सतीगुड़ा डैम में टहलते हुए हमें लग रहा था कि हरी-भरी वादियों और अथाह जल सागर की गोद में हम आ बैठे हैं।यद्यपि डेम तक पहुंचने का रास्ता बारिश के कारण अस्त व्यस्त सा है पर वहां पहुंचने के बाद हरी भरी वादियों की खूबसूरत...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

विष्णु खरे की पुण्य तिथि पर उनकी कविता "जो मार खा रोईं नहीं" का पुनर्पाठ

विष्णु खरे जी की यह कविता सालों पहले उनके कविता संग्रह से पढ़ी थी। अच्छी  कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं तो भीतर भी उतर जाती हैं। उनमें से यह भी एक है। कविता के भीतर पसरे भाव को पिता के नज़रिए से देखूं या मासूम बेटियों के नज़रिए से,दोनों ही दिशाओं से चलकर आता प्रेम एक उम्मीद  जगाता है।अपने मासूम बेटियों को डांटते ,पीटते हुए पिता पर मन में आक्रोश उत्पन्न नहीं होता। उस अजन्मे आक्रोश को बेटियों के चेहरों पर जन्मे भाव जन्म लेने से पहले ही रोक देते हैं। प्रेम और करुणा से भरी इस सहज सी कविता में मानवीय चिंता का एक नैसर्गिक भाव उभरकर आता है।कोई सहज कविता जब मन को असहज करने लगती है तो समझिए कि वही बड़ी कविता है।  आज पुण्य तिथि पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि ! जो मार खा रोईं नहीं  【विष्णु खरे】 ----------------------------- तिलक मार्ग थाने के सामने जो बिजली का एक बड़ा बक्‍स है उसके पीछे नाली पर बनी झुग्‍गी का वाक़या है यह चालीस के क़रीब उम्र का बाप सूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी अपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआ नाराज़ हो रहा था अपनी पांच साल और सवा साल की बे...

गजेंद्र रावत की कहानी : उड़न छू

गजेंद्र रावत की कहानी उड़न छू कोरोना काल के उस दहशतजदा माहौल को फिर से आंखों के सामने खींच लाती है जिसे अमूमन हम सभी अपने जीवन में घटित होते देखना नहीं चाहते। अम्मा-रुक्की का जीवन जिसमें एक दंपत्ति के सर्वहारा जीवन के बिंदास लम्हों के साथ साथ एक दहशतजदा संघर्ष भी है वह इस कहानी में दिखाई देता है। कोरोना काल में आम लोगों की पुलिस से लुका छिपी इसलिए भर नहीं होती थी कि वह मार पीट करती थी, बल्कि इसलिए भी होती थी कि वह जेब पर डाका डालने पर भी ऊतारू हो जाती थी। श्रमिक वर्ग में एक तो काम के अभाव में पैसों की तंगी , ऊपर से कहीं मेहनत से दो पैसे किसी तरह मिल जाएं तो रास्ते में पुलिस से उन पैसों को बचाकर घर तक ले आना कोरोना काल की एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी। उस चुनौती को अम्मा ने कैसे स्वीकारा, कैसे जूतों में छिपाकर दो हजार रुपये का नोट उसका बच गया , कैसे मौका देखकर वह उड़न छू होकर घर पहुँच गया, सारी कथाएं यहां समाहित हैं।कहानी में एक लय भी है और पठनीयता भी।कहानी का अंत मन में बहुत उहापोह और कौतूहल पैदा करता है। बहरहाल पूरी कहानी का आनंद तो कहानी को पढ़कर ही लिया जा सकता है।       ...

उदय प्रकाश की कहानी अंतिम नींबू बहुत कुछ कहना चाहती है

इंडिया टुडे के 10 जून 2020 अंक में उदय प्रकाश जी की कहानी अंतिम नींबू पढ़ने का अवसर मिला । कहानी थोड़ी लंबी जरूर है  पर यह अपनी रोचकता में, हर घड़ी बदलती नई-नई परिस्थितियों से उपजे नए नए रहस्यों में ,जो जिज्ञासा उत्पन्न करती है वह इस कहानी की खूबी है। तेजी से बदलती परिस्थितियों के बावजूद हर घटना एक दूसरे से जुड़ी रहकर  कहानी को  एक सूत्र में बांधे रखती है। कहानी में किस्सागोई की ताजगी है, साथ ही भाषाई कलात्मकता और घटित प्रसंगों का चमत्कार भी है। इस कोरोना काल में चीन के वुहान शहर से निकले वायरस का प्रसंग जिस अर्थ और रूप आकार में कहानी में ध्वनित होता है वह पाठक को चमत्कृत करता है। साथ ही विश्व की तमाम राजनीतिक परिस्थितियां ध्वनित होने लगती हैं। एक वायरस जो इन दिनों भाषा के भीतर, हिंसक लोगों के भीतर गाली गलौज के रूप में घुस गया है वह भी उतना ही खतरनाक है जितना की वुहान शहर से निकला वायरस । और यह वायरस जिससे भाषा दिनों दिन मर रही है यह राजनीति की ही देन है । कहानी के अंतिम पैराग्राफ को देखिए जहां सारी बातें स्पष्ट होने लगती हैं- "अगर आप कहीं विनायक दत्तात्रेय को कहीं मास्क ...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

जीवन के पूर्वाद्ध में घटी अच्छी बुरी घटनाओं से मुक्ति और नए रास्तों के पुनर सृजन का संदेश : गोविंद निहलानी की फ़िल्म दृष्टि

बहुत दिनों बाद 1990 में बनी गोविंद निहलानी की फ़िल्म "दृष्टि" दोबारा देखी। इस फ़िल्म को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला हुआ है । डिम्पल कपाड़िया और शेखर कपूर के किरदार, विवाह बन्धनों में बंधे मध्यवर्गीय भारतीय स्त्री-पुरूषों के जीवन की कहानियों को ही साफगोई से अभिब्यक्त करते हैं । स्त्री पुरूषों के पारिवारिक जीवन में घटित हो रही हर घटना/परिघटना को सही नजरिए और खुलेपन के साथ देख पाने की दृष्टि पर केंद्रित यह फ़िल्म वैवाहिक जीवन के एक विमर्श की तरह भी है जो मनुष्य की भीतरी दुनियाँ का खाका भी खींचकर सामने रखती है।  स्त्री पुरुष के वैवाहिक जीवन में न जाने कितने उतार-चढ़ाव, अच्छे बुरे दिन आते जाते रहते हैं। संबंधों को बचाए रखने के लिए न जाने कितने समझौते करने पड़ते हैं।लड़ाई झगड़े ,प्रेम मोहब्बत , नोंक झोंक , मस्ती यायावरी जैसी न जाने कितनी बातें जीवन में होती हैं। ये सब जीवन के विविध रंग हैं जिनसे मिलकर जीवन आकार ग्रहण करता है। कोई भी फिल्म देखिये तो  जीवन के इतने सारे रंगों में से कुछ न कुछ रंग  फिल्म के भीतर दिखाई पड़ जाते हैं । दृष्टि फ़िल्म में भी स्त्री पुरुष के वैवाहिक जीवन स...

चित्रकला प्रतियोगिता में सेंट टेरेसा स्कूल रायगढ़ के कक्षा सातवीं के छात्र आयुष साहू को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 50,000 पचास हजार रूपये का चेक प्रदान किया गया।

रायगढ़ ।  केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय भारत सरकार की देखरेख में ऊर्जा संरक्षण राज्य स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता 27 नवंबर को दुर्ग जिले के कुम्हारी स्थित पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन परिसर में संपन्न हुआ। पेंटिंग कॉम्पटीशन में छत्तीसगढ़ राज्य से विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने भाग लिया। रायगढ़ जिले के सेंट टेरेसा कान्वेंट स्कूल बोईरदादर रायगढ़ के छात्रों की भी इस प्रतियोगिता में सहभागिता रही।इस स्कूल के विद्यार्थियों की कला को समर्पित कल्पना शीलता का उल्लेखनीय प्रदर्शन यहां देखने को मिला।         चित्रकला प्रतियोगिता में सेंट टेरेसा स्कूल रायगढ़ के कक्षा सातवीं के छात्र आयुष साहू को ग्रुप A में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 50,000 पचास हजार रूपये का चेक प्रदान किया गया। इसी स्कूल के विद्यार्थी सुशांत शुक्ला (सातवीं), नावेद अनवर खान (दसवीं), शेख सनाउल्लाह (आठवीं) को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुआ।सांत्वना पुरस्कार के तहत इन तीनों छात्रों में प्रत्येक को 7,500 (सात हजार पांच सौ)रूपये के चेक प्रदान किये गए। स्कूल के चित्रकला शिक्षक तोष कुमार साहू की क...

परिधि को रज़ा फाउंडेशन ने श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र सत्र में बोलने हेतु आमंत्रित किया "युवा 2024" के तहत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में आज है उनका वक्तब्य

परिधि को रज़ा फाउंडेशन ने श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र सत्र में बोलने हेतु आमंत्रित किया "युवा 2024" के तहत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में आज है उनका वक्तब्य रज़ा फाउंडेशन समय समय पर साहित्य एवं कला पर बड़े आयोजन सम्पन्न करता आया है। 27 एवं 28 मार्च को पुरानी पीढ़ी के चुने हुए 9 कवियों धर्मवीर भारती,अजितकुमार, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,विजयदेवनारायण शाही,श्रीकांत वर्मा,कमलेश,रघुवीर सहाय,धूमिल एवं राजकमल चौधरी पर एकाग्र आयोजन रखा गया है।दो दिनों तक चलने वाले 9 सत्रों के इस आयोजन में पांचवा सत्र श्रीकांत वर्मा  पर एकाग्र है जिसमें परिधि शर्मा को बोलने हेतु युवा 2024 के तहत आमंत्रित किया गया है जिसमें वे आज शाम अपना वक्तव्य देंगी। इस आयोजन के सूत्रधार मशहूर कवि आलोचक अशोक वाजपेयी जी हैं जिन्होंने आयोजन के शुरुआत में युवाओं को संबोधित किया।  युवाओं को संबोधित करते हुए अशोक वाजपेयी  कौन हैं सैयद हैदर रज़ा सैयद हैदर रज़ा का जन्म 22 फ़रवरी 1922 को  मध्य प्रदेश के मंडला में हुआ था और उनकी मृत्यु 23 जुलाई 2016 को हुई थी। वे एक प्रतिष्ठित चित्रकार थे। उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल य...