सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपरूपा पंडित की कविताएँ

 

"क्योंकि दुःख घुल जाता है उसके जल में" 

अपरूपा पंडित की कवितायेँ पहली बार मैंने परिकथा में पढ़ी थीं | वे वर्तमान में लामडिंग असम में रहती हैं और वहां के एक विश्वविद्यालय में हिन्दी बिषय में पीएचडी स्कॉलर हैं | अपरूपा बाहरी दुनियां को अपने भीतर जिस संवेदना के साथ गहराई में जाकर महसूस करती हैं उस महसूसने को उनकी कवितायेँ भलीभांति रिप्रेजेन्ट करती हैं | जीवन यात्रा और उससे उपजे अनुभव और स्मृतियों को अपने अतीत और वर्तमान की आँखों से देखने परखने का एक अलहदा नजरिया अपरूपा के पास है , वह नजरिया उनकी कविताओं में घुला मिला है | प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों से उपजी संवेदनाएं, जीवन के सुख दुःख को सहजता से भांप लेती हैं , तभी तो वे अपनी कविता नदी उदास नहीं होती में कहती हैं ---- "क्योंकि दुःख घुल जाता है उसके जल में" ! अपरूपा का अनुग्रह के इस मंच पर हार्दिक स्वागत है !





 1.नदी उदास नहीं होती
--------------------------------
नदी
बहती रहती पुल के नीचे
अपनी धुन में
दायें - बाएं किनारों से
गले मिलती ,बहती रहती
उसे कहाँ पता होगा
कि पुल पर खड़ा आदमी
कब से देख रहा उसे
अपलक
कुछ कौतूहल
कुछ बेजार सा
मगर नदी बहती रहती
क्या कभी ठहरकर
पुल पर खड़े आदमी से
उसने पूछा होगा
कि क्या सोच रहे भाई
कौन हो , कहाँ से आये
किनारे जल रही चिता
और उसके पास कुछ खड़े कुछ बैठे लोग
हवा में उठती जलते तन की चिराइन्ध गंध
मन को जाने कैसा बना देती है
क्या नदी को भी महसूस होता होगा
कभी क्षण भर के लिए रूककर पूछा होगा उसने
कि किसकी चिता जल रही
बच्चे , बूढ़े या नौजवान की?
असल में नदी को कुछ भी नहीं मालूम
वह तो बहती जाती
सदियों से जलती चिताओं के धुएं
और उनके परिजनों के चेहरे पर फैले
अपार दुःख को
अपने अथाह जल में समेटे
नदी अपना दुःख जाहिर नहीं करती
क्योंकि  दुःख घुल जाता है उसके जल में !
2.अप्रत्याशित जीवन
-------------------------
जो भी घटा इस  जीवन में
वह अप्रत्याशित है?
मगर मैंने तो खुद चुना है इसे
अतीत  वाह  है
जितनी बार आया वो करीब
हाथ छुड़ा लिया मैंने  
हमेशा करती रही प्रतिवाद
एक बार तो खुदा
भी देता होगा मौका प्रायश्चित का
पर न दिया इस अभिमानी मन ने
अहम के विकट बोध ने
सुला दिया गहरी नींद में
एक अनसुनी तड़प को
जिसमें आज जल रही हूँ मैं
मिथ्या बोध के
मुर्दा क्षण  में
आज क्यूँ लगा हो रहा
उसकी नफरत से
उससे मुक्ति चाहने वाला यह मन
आज क्यूँ चाह रहा है
फिर से कैद होना ?
 
3.एकांत
---------------------
एकांत एकांत और एकांत
क्या खुद को सबसे
अलग करके रखने का नाम है एकांत?
दूर कहीं पहाड़ की चोटी पर
बैठे आसमान की ओर देखना है एकांत ?
भरी महफिल का उल्लास छोड़कर
खुद को अंधेरे कोने में समेट लेना
ही एकांत ?
हाँ.... हाँ
तुम नहीं समझोगे
तुम तो रहते हो उस वर्तमान में
जो शाश्वत से है कोसों दूर
हाँ मैंने जानना चाहा
शुरू से शेष प्रांत तक
गहरी निस्तब्धता के
उन उन्मादी ख़यालों में
जहां तुम्हारी मौजूदगी
हरेक क्षण मेरे साथ थी !
 
व्यस्तता भरे जीवन के
भाग दौड़ से क्लांत होकर भी
एक ही चीज ढूंढती हूँ
तुमसे खयालों में मिलना
प्यार, नाराजगी और विषाद
हर दशा में अविरल धारा सी
क्या अब भी तुम कहोगे
एकांत सिर्फ और सिर्फ एकांत !
 
 
4.भूली बिसरी यादें
---------------------------------
भूली बिसरी यादें
पता नहीं क्यूँ
आज फिर  ताजा
हो गयीं  
मेरी आँखों के कोनों से
झरती बूंदों में
बरसों बाद आज मैंने
फिर से नहा लिया
धुंधली यादों के साये में !
 
आज आसमान देखो
कितना सौम्य दिखता है
न अमानिशा
न ही पूर्णिमा
आज मेरी दृष्टि जा रही है
उस पहली बरसात की ओर
जहां से शुरू हुई थी
प्रथम प्रणय की पहली यात्रा
एक बाली लड़की
जिसे न वर्तमान की चिंता
न भविष्य का डर
बस एक छोटी सी चाहत लिए
जी रही थी अपनी छोटी सी दुनिया
इतिहास गवा है
कि समझदारी प्रेम की भाषा नहीं
फिर क्यों प्रताड़ित हो रही थी
बार बार !
 
जिसे वह अब तक प्यार
ही समझ बैठी थी
फिर उसके बाद  
वह धीरे धीरे सब कुछ खो बैठी थी
मित्र, परिवार
यहाँ तक कि
अपनी आत्मा को भी !
 
आत्मा  क्षत विक्षत होती है
तब  ढूंढने लगती  है
सहारे का हाथ
मिला हाथ ऐसा
जैसे मुरझाए हु पौधे को
कुछ बूंद पानी मिला हो  !
 
धीरे धीरे वह ढूंढने लगी
बोध , आत्मसम्मान की परिभाषा और एक पहचान
और साथ में समझ रही थी
ढाई आखर प्रेम की एक अलौकिक परिभाषा
फिर वह दिन आ ही गया
जिस दिन उतार फेका
अपने मन,  अपनी चिंता पर पड़ी बेड़ियों को !
 
आज नदी शांत है
फिर भी लहरें मानो बीच बीच में
किनारे को डुबो देती हैं
भूले बिसरी यादों के साथ!
 
5.जाने कहां छुप गया
---------------------------------
कहां छुप गया मेरा
उल्लसित शैशव
खोज रही हूं वही शोर
जो बंद आँखों की
स्मृतियों में अब भी किरकिराता है
और भर आता है खारा जल
जाना चाहते हैं पांव
पीछे की ओर
पर उस तरफ तो धुंधला सा है
अब एक महाशून्य
मेरी खोई
वीरान आंखों की नींद को
यादों ने निर्वासित कर दिया है
रह गहैं बादल के फाहे की तरह
उड़ती उदासियां
खाकर हवा के झोंके
इन्हीं के बीच ढूंढ़ती हूं
अपने बचपन के साए
कहां छुप गयीं बचपन की वो रंग बिरंगी किताबें
जिनमें दर्ज है मेरी अपनी कहानी
हरे भरे बचपन की
मैं ही हूं मुख्य पात्र
और मैं ही
वह गूंगा दर्शक जो
स्थिर चित्त से देख रहा !
 
याद है वह चंदा मामा
जिसे भर लेने को
जी मचलता था
कुछ भी नहीं रहा
सब फिसल गया
मुठ्ठी में भरी रेत की तरह
जिनमें ढूंढ़ती हूं
बचपन के छोटे छोटे
पैरों के निशान
कमरे में भरा है अनसुना सा कोलाहल
एकांत सन्नाटा पसरा है
मुझे घेरकर
साथी बनकर
पर जाने कहां खो गए
बचपन के साथी के
वो छोटे छोटे हाथ
जो मचल उठते थे आलिंगन के लिए
आज क्यों नहीं देख पाती
खींच रहा पीछे
न जाने कौन
शायद शैशव की
स्मृतियां
और क्या मैं यही नहीं ढूंढ़ रही  
वर्षों से
सदियों से
शायद अनन्त काल से !
-------------------------
संपर्क :  aparupapandit100@gmail.com 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

'कोरोना की डायरी' का विमोचन

"समय और जीवन के गहरे अनुभवों का जीवंत दस्तावेजीकरण हैं ये विविध रचनाएं"    छत्तीसगढ़ मानव कल्याण एवं सामाजिक विकास संगठन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष सुशीला साहू के सम्पादन में प्रकाशित किताब 'कोरोना की डायरी' में 52 लेखक लेखिकाओं के डायरी अंश संग्रहित हैं | इन डायरी अंशों को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने 2020 और 2021 के वे सारे भयावह दृश्य आने लगते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में हम सब की हिस्सेदारी रही है | किताब के सम्पादक सुश्री सुशीला साहू जो स्वयं कोरोना से पीड़ित रहीं और एक बहुत कठिन समय से उनका बावस्ता हुआ ,उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने अनुभवों को शब्दों का रूप देते हुए इस किताब के माध्यम से साझा किया है | सम्पादकीय में उनके संघर्ष की प्रतिबद्धता  बड़ी साफगोई से अभिव्यक्त हुई है | सुशीला साहू की इस अभिव्यक्ति के माध्यम से हम इस बात से रूबरू होते हैं कि किस तरह इस किताब को प्रकाशित करने की दिशा में उन्होंने अपने साथी रचनाकारों को प्रेरित किया और किस तरह सबने उनका उदारता पूर्वक सहयोग भी किया | कठिन समय की विभीषिकाओं से मिलजुल कर ही लड़ा जा सकता है और समूचे संघर्ष को लिखि...

सीमा शर्मा की कहानी चिलगोजे का तेल

  हाल के वर्षों में युवा कथा लेखिका सीमा शर्मा की कई कहानियों ने जिस तरह पाठकों से संवाद किया है , कथा जगत में एक आशा जगाने वाली घटना के बतौर उसे देखा जाने लगा है ।   यह बात उस संदर्भ में कही जा रही है कि सीमा की कहानियों का जो कंटेंट है वह थोड़ा अलहदा है । अलहदा इस सन्दर्भ में कि समाज में अलक्षित रह जाने वाली घटनाओं पर लेखिका की पैनी नजर गयी है और अपने आस पड़ोस की अनुभवजनित घटनाओं को उन्होंने कहानी में शिल्प और भाषायी स्तर पर एक नयी खूबसूरती प्रदान की है ।  चाहे उनकी कहानी  ' मैं रेजा और पच्चीस जून ' की बात करें , कहानी ' चरित्र प्रमाण ' की बात करें या यहाँ ली जा रही कहानी ' चिलगोजे का तेल ' की बात करें , इन सभी कहानियों में कथा रचना की एक नयी दृष्टि से पाठकों का परिचय होता है। अब तक सीमा की कहानियाँ कथादेश , परिकथा , इन्द्रप्रस्थ भारती , कथाक्रम , जनसत्ता , नया साहित्य निबंध सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चा पा चुकी हैं ।   उनकी कहानियां अपनी भाषा और कथ्य के साथ जिस तरह अपने समय से टकराती हैं , वह उन्हें पठनीय बनाती हैं।   कहानी में किसी महिला ले...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

'नेलकटर' उदयप्रकाश की लिखी मेरी पसंदीदा कहानी का पुनर्पाठ

उ दय प्रकाश मेरे पसंदीदा कहानी लेखकों में से हैं जिन्हें मैं सर्वाधिक पसंद करता हूँ। उनकी कई कहानियाँ मसलन 'पालगोमरा का स्कूटर' , 'वारेन हेस्टिंग्ज का सांड', 'तिरिछ' , 'रामसजीवन की प्रेम कथा' इत्यादि मेरी स्मृति में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं । हाल के दो तीन वर्षों में मैंने उनकी कहानी ' नींबू ' इंडिया टुडे साहित्य विशेषांक में पढ़ी थी जो संभवतः मेरे लिए उनकी अद्यतन कहानियों में आखरी थी । उसके बाद उनकी कोई नयी कहानी मैंने नहीं पढ़ी।वे हमारे समय के एक ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियां खूब पढ़ी जाती हैं। चाहे कहानी की अंतर्वस्तु हो, कहानी की भाषा हो, कहानी का शिल्प हो या दिल को छूने वाली एक प्रवाह मान तरलता हो, हर क्षेत्र में उदय प्रकाश ने कहानी के लिए एक नई जमीन तैयार की है। मेर लिए उनकी लिखी सर्वाधिक प्रिय कहानी 'नेलकटर' है जो मां की स्मृतियों को लेकर लिखी गयी है। यह एक ऐसी कहानी है जिसे कोई एक बार पढ़ ले तो भाषा और संवेदना की तरलता में वह बहता हुआ चला जाए। रिश्तों में अचिन्हित रह जाने वाली अबूझ धड़कनों को भी यह कहानी बेआवाज सुनाने लग...

" रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे?" रमेश शर्मा की चर्चित कहानी

इस कहानी पर हरियश राय जी अपनी  टिप्पणी में लिखते हैं - ‘ परिकथा ’ के सितम्बर-अक्टूबर   2020 अंक में प्रकाशित  रमेश शर्मा की कहानी ‘ रिजवान तुम अपना नोट बुक लेने कब आओगे ‘ कोरोना काल के संदर्भों पर लिखी गई एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी में रमेश शर्मा ने कोरोना काल में मजदूरों का पलायन और उस पलायन से उपजे दुःख को मानवीयता के साथ देखने की कोशिश की है। इस काल में पलायन से उपजे भयावह सन्दर्भों  को एक छोटी लड़की की नजर से देखते हुए कहानी सरकार के प्रति  एक नफरत का भाव पैदा करती है। देश बंदी के निर्णय के कारण लोगों के जीवन में अफरा-तफरी मची और आजीविका का संकट उनके सामने आ गया और उनके बीच से गुजरती हुई कहानी उनकी बेबसी को रेखांकित करती है। कहानी में एक फ्रीलांस रिपोर्टर , टाट से घिरी झोंपड़ी नुमा गुमटी में बैठकर भूली बिसरी बातों को याद करने की कोशिश करती है। वह झोपड़ी एक चाय बेचने वाले बाबा की है। वह बाबा अखबार उसके सामने रख देता है , जिसमें लिखा है कि ‘ समय के भीतर हाहाकार मचाता यह कैसा रुदन है कि कोई किसी का दर्द बांटने के लिए उससे बात भी न करे।...

आलोचक नन्द किशोर आचार्य का महत्वपूर्ण वक्तब्य : छत्तीसगढ़ साहित्य एकेडमी का आयोजन

  ब तौर आलोचक प्रभात त्रिपाठी किसी कविता के पास, किसी कहानी के पास या किसी उपन्यास के पास उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जाते हैं जिस तरह कि वे स्वयं की रचना के पास जाते हैं   -  आलोचक नंद किशोर आचार्य  आयोजन में बोलते हुए आलोचक नंदकिशोर आचार्य आलोचना का मतलब है आलोचन। पूर्णता से  उसको  समझने की कोशिश । अगर वो आप नहीं करते हैं , आपने यह तय कर लिया कि सिर्फ दाखिल करना है या खारिज करना है कि ये अच्छा कवि है या अच्छा कवि नहीं है तब तो आपके लिए कविता अन्वेषण नहीं है । आपके लिए कविता  अपने पूर्व निर्धारित विचारों का स्थापन भर है और उसके विरोध में आने वाले विचारों को खारिज करने का एक बहाना भर है।अच्छा आलोचक किसी को खारिज नहीं करता, वह उसमें से कुछ ढूँढ़ कर निकालता है और उस प्रक्रिया में आलोचना का जन्म होता है । प्रभात त्रिपाठी किसी पूर्व निर्धारित प्रतिमान को लेकर के या किसी पूर्व निर्धारित थियरी को लेकर के कविता के पास , कला के पास या उपन्यास के पास नहीं जाते । वे जाते हैं एक पाठक के रूप में उसी अन्वेषण धर्मिता के साथ जिसके साथ कि वे स्वयं अपनी रचना में ज...

रायगढ़ का कमला नेहरू पार्क : इतिहास और स्मृतियां Raigarh ka kamla neharu park: Itihas aur smritiyan

रायगढ़ के ह्रदय स्थल चक्रधर नगर चौक में स्थित है कमला नेहरू पार्क। यह पार्क शहर की जरूरतों के हिसाब से  वर्तमान में शहर के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है | यहां बच्चे बूढ़े युवा सारे लोग सुबह शाम स्वास्थ्य और मानसिक तंदुरुस्ती के हिसाब से नियमित आते जाते हैं और यह जगह इस अवधि में गुलज़ार रहता है । मैं यहाँ से निकटस्थ किरोड़ीमल साइंस कॉलेज में सन 1983 में बी.एस-सी.में एडमिशन लिया था और एम.एस-सी.मैंने वहीं पूरी की । इन पांच छः सालों के दरमियान इस जगह के सामने की सड़क से होकर हम लोगों का अक्सर आना जाना होता था ।  यह पार्क उन दिनों उतना विकसित नहीं हुआ था इसलिए इसने इस तरह कभी मेरा ध्यान नहीं खींचा था । मैं बीच-बीच में भी कभी कभार वहां जाया करता था। आज 26 मार्च 2023 को बहुत दिनों  बाद वहां गया तो वहां के परिसर की सुंदरता देखकर मुझे बहुत खुशी हुई । इस पार्क को निर्मित हुए भी 35 साल गुजर चुके हैं और इन 35 सालों में इस शहर ने बहुत कुछ बदलाव देखा है।इसका निर्माण अस्सी के दशक में  हुआ और इसका रख रखाव नगर पालिका रायगढ़ के माध्यम से ही उस समय हुआ करती था। धीरे धीरे फिर इसका थोड़ा बहु...

कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति - वरिष्ठ कथाकार उर्मिला आचार्य का आलेख

  कथायात्रा के टेढ़े मेढ़े रास्ते और समकालीन कहानी की परिधि में रमेश शर्मा की उपस्थिति -------------------------------------------------------------------------- -----------------------------------------                                - उर्मिला आचार्य कथा कहानी के इर्द गिर्द रचनाकार की उपस्थिति किस रूप में , किस तरह और कहाँ कहाँ हो सकती है , इसका आकलन करना दिलचस्प होते हुए भी एक दुरूह कार्य है । आकलन न कहते हुए अगर इसे शोध या कोई खोज पूर्ण कार्य कहा जाए तब भी हम इसे सामान्यीकृत नहीं कर रहे होते हैं । कथा लेखन करने के लिए लेखक जिस दुनिया में उतरता है , जिन रास्तों से होकर आगे बढ़ता है , उस दुनिया तक पहुँचने के लिए उन रास्तों से होकर गुजरे बिना हम लेखक का पीछा नहीं कर सकते । यहाँ पीछा करने के अपने निहितार्थ हैं जहाँ से हम लेखक को जानने समझने के लिए उन्हीं रास्तों से होकर गुजरते हैं जहाँ से लेखक अपनी कथायात्रा के साथ आगे बढ़ता है। ...

Gupta Vrindavan Puri Odisha Yatra गुप्त वृंदावन पुरी ओड़िसा यात्रा

पुरी के आसपास के दर्शनीय स्थलों में गुप्त वृंदावन , जिसे कि श्री गौर बिहार आश्रम, माता मठ के नाम से भी जाना जाता है , बहुत सुंदर जगहों में से एक है । यह पुरी के केमलिया सि-बीच से बहुत नजदीक है । जानकारी के अभाव में पुरी आकर भी पर्यटक इस जगह की यात्रा नहीं कर पाते । इस तरह एक सुंदर और ऐतिहासिक जगह से वे वंचित हो जाते हैं। इसलिए इस जगह के बारे में जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से इस आलेख को आप जरूर पढ़ें और यहां कभी जाने के सम्बंध में भी विचार करें ।यहां जो भी बातें मैं लिख रहा हूं, मेरे स्वयं के जीवंत अनुभवों पर ही सारी बारें  आधारित हैं । मैं पुरी की यात्रा पर 6 बार आ चुका हूं परंतु इस जगह के बारे में छठी यात्रा के दरमियान ही मुझे जानकारी मिली और हम लोग वहां पहुंच पाए । गुप्त वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति  पुरी ओडिशा के श्री गौर बिहार आश्रम /गुप्त वृंदावन  /माता मठ को बहुत आकर्षक और अच्छी तरह से सजाया गया है। यहां का माहौल बहुत शांत है साथ ही प्राकृतिक छटाओं से अत्यंत समृद्ध और परिपूर्ण है। यहां जब हम पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे किसी तपोभूमि में हम पहुंच गए हैं। य...

देवेश पथ सारिया की कवितायेँ : कविता संग्रह 'नूह की नाव' से चुनी हुईं कविताओं का पाठ.

दे   वेश पथ सारिया हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवियों में से एक हैं । हाल ही में भारतीय साहित्य अकादेमी  से उनकी कविताओं का एक संग्रह 'नूह की नाव' प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में बहुत सी कवितायेँ मुझे पसंद हैं । उनमें  से चुनी हुई छः कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं.   "देवेश की कविताओं में मूर्तमान होती चीजों में भी एक तरह से अमूर्त सा लगने वाला अति सूक्ष्म विवेचन है जो अमूमन हमारी नज़रों से छूट जाता   है । उन छूटी हुई चीजों से देवेश हमारा परिचय कराते हैं । उनकी कविताओं में चेतन अचेतन रूप में फैले हुए मानवीय जीवन के राग-विराग सह्सा इस तरह आने लगते हैं कि कई बार चकित होना पड़ता है । कवि के पास जीवन और बदलते समय को देखने परखने की एक अलहदा दृष्टि भी है जो इन कविताओं को पुष्ट करती है । उनकी कहन शैली से भी कविताओं में भाषिक सौन्दर्य उत्पन्न होता है"-  रमेश शर्मा   एक पहिये की साइकिल वाला बच्चा एक धूरी पर घूमती है सारी पृथ्वी यह बेहद मामूली लेकिन जरूरी पाठ मुझे फिर से याद आया था उस ताईवानी बच्चे को देखकर जो निकल पड़ा था चिंग हुआ यूनिवर्सिटी की व्...